आंतरिक बल (भाग – 1)-स्व संवाद

एक शेर को टांग पर बहुत चोट लग गई और वह एक गुफा में घुस गया। 2-3 दिन बाहर। नहीं निकला तो शिकारियों ने उस गुफा में घुस कर देखा कि गुफा में एक नाला बह रहा है तथा। शेर उसके पास लेटा हुआ है और थोड़ी थोड़ी देर बाद पानी पी लेता है। 10-15 दिन बाद जब शेर बाहर निकला तो सम्पूर्ण स्वस्थ था। इस से लोगों को पता लगा कि पानी से रोग भी ठीक होते हैं। वह पानी ऐसी जड़ी बूटियों से स्पर्श करता हुआ बह रहा था जो औषधि बनाने के काम आती थी। इसी तरह मन सांस के द्वारा आकाश से वाष्प तथा समुद्र और नदियों से लवण, मिनरल व नमक आदि जो शरीर के लिये जरूरी होते हैं,खींचता रहता है। इस तरह प्रकृति का यह अनूठा ढंग है शरीर को जल प्रदान करने का। मन के बुरे विचार, समुद्र पर प्रभाव भी डालते हैं। इस समय विश्व का हरेक व्यक्ति। नकारात्मक सोचता है, जिस का सामूहिक प्रभाव समुद्र में उत्तेजना पैदा कर देता है, इसका परिणामस्वरूप समुद्री तूफान आते हैं। हर घण्टे में प्रत्येक व्यक्ति 12 मिनट तक अग्नि तत्वस जुड़ा रहता है। शरीर को गर्म रखने के लिए ऊर्जा की जरूरत होती है। यह ऊर्जा हम सूयता से प्राप्त करते हैं। हम 12 मिनट में ही सूर्य से एक घण्टे के लिये जरूरी ऊर्जा खींच लेते हैं । व्यक्ति 8 मिनट तक वायु तत्व से जुड़ा रहता है। वायु तत्व से हम ऑक्सीजन लेते है ज पौधों से मिलती है। इसके अलावा वायुमंडल में जो ऑक्सीजन होती है वहॉं से भी प्राप प्ति कर लेते हैं। अतिरिक्त आवश्यक तत्व भी हवा से हम लेते रहते हैं। हम भगवान से जीवनी शक्ति प्राप्त करते हैं। जैसे नींद और कुछ नहीं उस । भगवान से जुड़ जाते हैं और उस से शक्ति प्राप्त कर लेते हैं और एक दिन के लियत जाते हैं। यद्यपि इसे विज्ञान अभी नहीं मानता। अध्यात्म इसे मानता है। फिर भा विषय है। हर घण्टे में व्यक्ति चार मिनट तक आकाश तत्व से जुड़ा रहता है। इस हम आकाश से विद्युत तरंगे, चुम्बकीय तरंगे, भगवान की शक्ति प्राप्त करते है। यह होता है, इसे योगा ही समझ सकता है। विज्ञान का कोई साधन इसे नहीं पकड़ समा सोच के अनुसार आकाश में उपलब्ध संकल्पों से जडे रहते हैं। हमारे जैसे व्यक्ति समय हम दिन के लिये तरोताजा हो है। फिर भी ये शोध का है। इस समय में भी करते हैं। यह बहुत सूक्ष्म । पकड़ सकता। हमारी जस व्यक्तियों से जुड़े रहते हैं। जब हम दायें नाक से सांस लेते हैं तो पहले धरती फिर जल फिर अग्नि फिर वायु फिर आकाश तत्व से ऊर्जा लेते हैं। जब दायॉं स्वर चलता है तो पहले 20, 16, 12, 8 और 4 मिनट पवी तत्व, जल तत्व, अग्नि तत्व, वायु तत्व और आकाश तत्व से हम सांस के द्वारा जुड़े रहते सहितने समय हम इन तत्वों से ऊर्जा प्राप्त करते हैं। जब हम बायें नाक से सांस लेते हैं तो पहले आकाश फिर वायु फिर अग्नि फिर जल फिर धरती तत्व से शक्ति प्राप्त करते हैं।

(प्रजापिता ब्रम्हाकुमारी ईश्‍वरीय विश्‍व विद्यालय) 

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