‘विमलवाणी’

श्री आनंद गुरुवे नमः – प्रभु महावीर की अंतिम देशना उत्तराध्यायन सूत्र। आगम मे हर चीज का वर्णन मिलता है आगम 32, अनुयोग 4 होते है। (1) द्रव्यानुयोग (2) चरितानुयोग (3) गणितानुयोग (4) धर्मकथानुरोग। उत्तराध्ययन सूत्र 4 अनुयोगोने समाविष्ट हो जाता है। जैन धर्ममे उत्तराध्ययन सूत्रका बहोत महत्व है। दुनियासे जाते जाते अंतिम देशना भ. महावीर स्वामीने दी है। सभी अध्ययन इसमे बहोत महत्वपूर्ण है। ज्ञानके मोती इसमे भरे हुये है। उम्रका कोई भरोसा नही कब आयुष्यकी डोरी टुट जाये ये हमे मालुम नही। वह बचनेवाला नही है। आयुष्यकी डोरीको कोई वापस जोड नही सकता। आयुष्य किसीकाभी बढा या घटा नही सकते। हे मनुष्य तु सजग रहे। पुण्यके सहयोगी सभी बन जाते। पाप के सहयोगी कोई नही बनते। धनसंपत्ती के बटवारे हो सकते है। लेकिन पाप के भागी कोई नही बन सकता। पाप का फल भोगनेको कोई तैय्यार नही होता।

भ.ने पशुपक्षीयोंके वर्णन द्वारा आगम समझाया है। आत्मज्ञानी व्यक्ति हरदम जागता रहता है। भगवान महावीर कहते है सोये हुये के बीचमे भी जो जागता है आत्माको जगाता है वह संसारमे सब कुछ पा लेता है। भारंड पक्षी पौराणिक कथाओमे सुनाई देता है। प्रत्येक व्यक्ति कर्मशील है। लेकिन उस वक्त ज्ञानके चक्षु जरुर खुले रहे यह भगवान कहते है। कर्म भी करो तो ज्ञान के साथ करो। भारंड पक्षी सावधानीसे जीवन आगे बढाता है। जो भी धर्मआराधना करना है। यथा समय करे। जीवन मे धर्मआराधना नही कि जो नरक गती की ओर बढोगे। बालमरण नही पंडित मरण से हमारा मरण आना चाहिये। घडका निचेका पेट कितना बडा होता है उसीतरह हमारे कर्मो का है। मृत्यु महोत्सव होना चाहिये। सकाम मरण का प्रपत करे। श्रावक को प्रतिदिन। सामाईक का नियम होना चाहिये। साधु और श्रावक सभीके लिए पंडित मरण भगवान ने कहा है। छोटे साधु के लिए भगवन ने पमीया कितनी भी प्रकारकी भाषाये करते बिना आत्मज्ञान के वह अविज्ञावान ही कहलाता है। हे निग्रंथ तु अपने जीवनमे ज्ञानचक्षु को खोलकर रखना। नवदिक्षीत साधु के लिए बहोत अच्छा विवेचन किया है। श्रीपाल का विवाह रयणमंजुषा को साथ होता है। सभीजण रयणमंजुषा का पुरा परिवार मुनीराम के दर्शन को जातै हे। धवलसेठ को भी वहा लाया गया। धवलसेठ को बहोत इर्षा होती है क्युं कि श्रीपाल के पास बहोत संपत्ती हो जाती है। (क्रमशः)

श्री आनंद गुरुवे नमः – प्रभु महावीर की अंतिम देशना। 32 आगममे यह एक आगम मेमने के उदाहरण के साथ भगवानने बहोत सुंदर रुपसे विवेचन किया है। एक व्यक्तीने गायको भी और मेमने को भी पाला है। बच्चा कहता है मॉं तु जो गाय को भी और मेमने को भी घास खिलाती है गाय तो सुखा घास खाने भी दूध देती है और मेमने के लिए हरा घास देकर उसे घष्टपुष्ट बनाया है लेकिन प्रभु कहते है उस मेमने के लिए कहा है अगर घरमे मेहमान आते है तो मदिरा मास के सेवन करनेवालोके लिए उसका उपयोग कर लेते है। वर्तमान मे आ रहा सुख वो भी हम छोड देते है और भविष्यकी चिंता मे लगे रहते है। ज्ञानी कहते है नश्‍वर भोगो के पिछे भागते हो और जो अपना है उसे भी छोड देते हो। जो मुल पुंजी बढाता है तो वह देव भव प्राप्त करता है। अनंत अनंत गुणा सुख मोक्ष मे है। जीवन नश्‍वर है जो हिंसा आदी करता है वह नरकगतीको प्राप्त करता है। धवलसे मनमे लोभ भी आता है और श्रीपाल को मारनेकी योजना करता है। श्रीपाल की पत्नीया एवं धन को प्राप्त करनेके लिए घवलसेठ युक्ती करता है और श्रीपाल को फसाने का काम करता है। श्रीपाल को घवलसेठ मगरमच्छ देखने के बहाने उपरसे निचे समुद्र मे ढकेलता है। श्रीपाल नवकारमंत्र का जाप करता है।

(क्रमशः) – जैन श्रावक संघ, अहमदनगर

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