आत्मिक शांति की खोज-दिव्य प्रेम

आत्मा जितनी आगे बढ़ती जाती है, उतने अधिक हर्षोल्लास का यह अनुभव करती जाती है। जितने अधिक हर्षोल्लास का यह अनुभव करती है, उतने ही और अधिक हर्षोल्लास की यह कामना करती है। संत दर्शनसिंह जी ने अपने एक शे’र में फ़र्माया है : उम्मीद थी जिनसे कि बुझाएंगे मेरी प्यास वो और भी कुछ प्यास को भड़का के चले हैं। – मताओ-नूर (उर्दू गजलें 75) दिव्य मिलाप – अधिक से अधिक हर्षोल्लास को पाने की हमारी आत्मा की बलवती इच्छा उसे सूक्ष्म, कारण व महाकारण लोकों में से निकालकर और ऊपर ले जाती है, जब तक कि यह प्रभु के धाम, सचखंड में नहीं पहुँच जाती। वहॉं पर अंत में यह प्रभु से एकमेक हो जाती है, अपने स्रोत में। विलीन हो जाती है। दोनों एक हो जाते हैं। इस एकमेकता से आत्मा सबसे अधिक सुख का अनुभव कर पाती है। हम प्रेमी-प्रेमिका एवं माता-पिता और बच्चे के मिलाप का अंदाज़ा लगा सकते हैं। इस मिलाप में प्रेम, खुशी और संतुष्टि होती है। पर आत्मा और परमात्मा के मिलाप में इससे लाखों गुणा प्रेम, संतुष्टि व सुख मि लता है। यह परमसुख अंतर में हम सब का इंतज़ार कर रहा है। यह ऐसा मिलाप है जो अशारीरिक है तथा शुद्ध रूप से आत्मा व परमात्मा के मध्य होता है। यह आध्यात्मिक। प्रेम है। यह प्रेम सृष्टि के हर अन्य प्रेम से कहीं ऊँचा है।

जिस प्रेम को आत्मा उस समय अनुभव करती है, जब वह वापिस प्रभु में अभेद हो जाती है, वह प्रेम शारीरिक प्रेम या कामुकता से बहुत ऊँचा होता है। यदि हम एक बार रूहानी प्रेम को चख लेत हता शारीरिक प्रेम में हमारे लिए कोई आकर्षण नहीं रहता। भौतिक शरीर के आनन्द मात्र जैविक व यांत्रिक (Biological Mechanical)  होते हैं। ये क्षणिक आनन्द की अनुभूति दे सकते हैं, लेकिन इसमें हमारी मॉंसपेशियॉं एवं स्नायु-तंत्र (Nervous System)  शामिल होते हैं और हमारा मस्तिष्क एवं इंद्रियॉं इस अनुभव को आनन्दमयी समझ लेते हैं। यह अनुभव केवल क्षणिक होता है। परन्तु वह प्रेम जिसका अनुभव हम तब करते हैं, जब आत्मा प्रभु में लीन होती है, वह हमें क्षण मात्र के लिए नहीं, बल्कि सदा-सदा के लिए तरबतर कर देता है। यह एक ऐसे समुद्र में तैरने के समान है, जिसकी लहरें लगातार हमें पूरी तरह भिगोती जाती हैं। प्रेम की लहरें हर क्षण हमारे दिल व आत्मा के अंतरतम् कोनों को छू जाती हैं व अपने साथ परम-सुख, संतुष्टि एवं शांति लेकर आती हैं। इसमें शारीरिक स्पर्श का कोई दखल नहीं होता। दिव्य प्रेम में कोई शारीरिक मिलाप नहीं होता। यह समय व स्थान से परे होता है।

(क्रमश:258) (कृपाल आश्रम, अहमदनगर) 

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