आत्मिक शांति की खोज-दिव्य प्रेम

हम अचानक ही सोचना शुरू कर देते हैं कि जीवन का अभिप्राय क्या है, हम कौन है और मौत के बाद हमारे साथ क्या होता है। यह परेशान करती धीमी आवाज़ समय के साथ तेज़ हो जाती है। हमारे अन्दर इन प्रश्नों की खोज करने के लिए एक खिंचाव पैदा हो जाता है। हमारे दिलों में यह खिंचाव खुद प्रभु पैदा करता है, ताकि वह हमें अपनी ओ. सकें। जिस क्षण उसे अवसर मिलता है, जिस क्षण वह देखता है। इस संसार और इसके आकर्षणों की वास्तविकता के बारे में कछ। है, वह उस समय का लाभ उठाता है। वह हमारे भीतर वह बीज डालन है, जो जीवन के रहस्यों को हल करने के लिए हमें प्रेरित करता उसका प्रेम हमारे भीतर कार्य करना शुरू कर देता है और हममें प्रभा जानने की इच्छा जागृत हो जाती है। यह हमारे लिए एक महान दिवस होता है, जब हम अपने सच्चे पिता को जानने की अपनी आत्मा की पुकार को सुनने लगते हैं। _जब हम इस ध्वनि की ओर अधिक ध्यान देते हैं जो कि हमें अपने घर की ओर खींचती है, तो प्रभु हमें ऐसे स्थान पर पहुंचा देता है जहॉं कोई महापुरुष रहता हो और वह हमें प्रभु की ओर जाने वाले रास्ते पर डाल देता है। प्रभु हमें एक सत्गुरु के पास पहुंचा देता है, जो हमें हमारे असली स्वरूप के बारे में समझाता है कि हम आत्मा हैं और प्रभु के अंश हैं। वह हमें ऐसा तरीका बताता है, जिसके द्वारा हम इस भौतिक जगत से ऊपर उठ सकते हैं और स्वयं देख सकते हैं कि हम प्रभु के अंश हैं। वह हमें सिखाता है कि हम भजन-सुमिरन कैसे करें और अंतर्मुख कैसे हों। वह हमें ’नाम’ या नी ज्योति व श्रुति की धारा से जोड़ देता है, जो कि प्रभु से तब उत्पन्न हुई थी, जब उसने इस सृष्टि को पैदा किया था। यही धारा उसकी ओर वापिस भी जाती है। यह एक ऐसी धारा है जो प्रभ की अंश है, सम्पूर्ण ज्योति, सम्पूर्ण संगीत व सम्पूर्ण प्रेम है। जब आत्मा। भजन-सुमिरन करती है और इस धारा के सम्पर्क में आती है तो यह एक परिपूर्णता और आनन्द का अनुभव करती है क्योंकि यह उसी न की बनी है, जिसकी यह धारा बनी है। हम ज्योति व श्रुति की धारा के सम्पर्क में आकर, किसी भी भौतिक मनोरंजन से मिलने वाली पी और संतोष से कहीं अधिक खुशी और संतोष का अनुभव करते । सम्पर्क में प्रेम की ऐसी शक्ति है, जो कि हमारा ध्यान प्रभ की देती है। तब हम पाते हैं कि भौतिक सुख अपना आकर्षण खोना शुरू कर देते हैं। हमें इस संसार में किसी भी चीज़ से इतनी संतुष्टि नहीं मिलती, जितनी हमें भजन-सुमिरन में ज्योति व श्रुति के सम्पर्क में आने पर मिलती है। आत्मा और अधिक परमानन्द की अभिलाषा करती है और आन्तरिक ज्योति व श्रुति में और अधिक समाहित हो जाती है। तब यह भौतिक जगत से ऊपर उठकर एवं शब्द धारा पर सवार होकर असीम सौंदर्य से भरे आंतरिक मंडलों में उड़ना आरम्भ कर देती है।

(क्रमश:257) (कृपाल आश्रम, अहमदनगर)

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