आंतरिक बल (भाग – 1)-प्रेम ही जीवन है

प्रेम और कामवासना – मनष्य जीवन की इकाई कोशिका है। अच्छा या बुरा बल कोशिका में ही पैदा होता है। कोशिका में गुण सूत्र के 23 जोड़े होते हैं। प्रत्येक जोड़े में एक गुणसूत्र पिता का और गणसत्र माता का होता है। 22 जोड़े ऐसे होते हैं जिनमें काम वासना सम्बन्धी कोई गण नहीं होता। 23वां जोड़ा जो होता है उसमें काम-वासना का बीज होता है। 22 जोड़े जो हैं उनसे सस बल पैदा होता है जिससे हम कार्य करते हैं। रोटी बनाते हैं, कपड़े धोते हैं। बोझ उठाते हैं या और कोई भी दिमाग का काम करते हैं। 23वां जोड़ा हमारे में विपरीत लिंग की तरफ आकर्षण पैदा करता है। जब भाई-बहनों की तरफ देखते हैं तो जो 23वां जोड़ा है जो उसे पिता से मिला होता है उसमें सकारात्मक चुम्बकीय बल पैदा होता है जो बहनों को अपनी तरफ आकर्षित करने लगता है। करोड़ो कोशिकाओं में एक-एक सूत्र यह बल पैदा करता है जोकि मिलकर बहत शक्तिशाली चुम्बक बन जाता है। जिसके परिणामस्वरूप मनुष्य दिन-रात इसी खिंचाव से

पीड़ित रहता है – इसी तरह जब बहनें भाईयों को देखती हैं तो जो 23वां जोड़ा होता है जो सूत्र उन्हें माता से मिला होता है उसमें नकारात्म क चुम्बकीय बल उत्पन्न होता है जो भाईयों को अपनी तरफ खींचता है। करोड़ो कोशिकाओं का बल मिलकर बहुत शक्तिशाली चुम्बक बन जाता है। जिसके कारण बहनें दिन-रात इसी खिंचाव से पीड़ित रहती हैं। यही काम वासना व अपवित्रता का कारण बनता है। कई व्यक्तियों में यह 23वां जोडा होता ही नहीं। उसके अंग तो विकसित होते हैं परंतु उनमें वासना उत्पन्न नहीं होती। इसलिये उनका मन कहीं नहीं भटकता। ऐसे मनुष्य महामानव होते हैं जो संसार में अद्भुत कार्य करते हैं। कई मनुष्यों में 22 जोड़े के बजाय 21 जोड़े ही होते हैं जो कार्य के लिये बल पैदा करते हैं। उनमें 22वां या 23वां जोड़ा आकर्षण (वासना) का कार्य करता है। ऐसे लोग लम्पट, महाक्रोधी, महा कमीना, महा अहंकारी होते हैं। वे जहॉं भी जायेंगे आफतें ही खड़ी करेंगे।

प्रेम और अपवित्रता – जब बच्चे का जन्म होता है तो पवित्रता बच्चे के माथे में होती है। इसलिये बच्चे का ललाट योगियों की तरह चमकता है। हर व्यक्ति को यह रुप प्यारा लगता है। बच्चा सबका मन मोह लेता है। पहले आठ वर्ष तक जब से बच्चा शब्द बोलने लगता है वस्तुओं एवं लोगों को पहचानने लगता है पवित्रता उसकी आँखों में रहती है।

(क्रमश:359) (प्रजापिता ब्रम्हाकुमारी ईश्‍वरीय विश्‍व विद्यालय) 

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