आत्मिक शांति की खोज -दिव्य प्रेम

यदि हम उस प्रेम को इतना फैला लें कि समस्त सृष्टि से हमें प्यार हो जाए, तो हम स्वयं अंदाज़ा लगा सकते हैं कि तब हमारे हृदय में कितना अधिक प्रेम होगा। ऐसा प्रेम पवित्र व आध्यात्मिक होता है। ऐसा प्रेम ही प्रभु को अपनी सृष्टि से होता है। प्रेम दिव्य है, प्रेम ईश्वरीय है, प्रेम एक आध्यात्मिक गुण है।

दिव्य प्रेम में आत्मा को अपने कर्ता, परमात्मा में पुनः विलीन होने की लालसा होती है। जब प्रभु ने अपने अंशों (यानी आत्माओं) को अपने आपसे अलग किया और उन्हें संसार में भेज दिया तो उस वक्त जुदाई का दुःख था। यह दुःख माता-पिता को होने वाले उस दुःख में के जैसा है, जो अपने बच्चे से बिछुड़ते समय उन्हें होता है। माता-पिता और बच्च के बीच प्रेम का बन्धन इतना गहरा होता है कि जब बच्चा जुदा होता है, तो माता-पिता अपने दिल में ज़बरदस्त झटका या तड़प महसूस करत हैं। जब बच्चा बहुत दूर चला जाता है, तो मोह और प्रेम की निरन्तर कसक माता-पिता अपने दिल में महसूस करते हैं। यह अचल प्रेम है. बच्चे काल दिन-रात माता-पिता के साथ रहता है। वे बच्चे के बारे में सोचते रहते ने के लिए प्रेम की भावना रखते हैं व उसे याद करते रहते हैं। प्रेम निरन्तर खिंचाव भी रहता है, जो बच्चे को चुम्बक की तरह पिता की ओर वापिस खींचता है। जब तक बच्चा दौड़ कर उनकी में नहीं आ जाता, माता या पिता को चैन नहीं मिलता। इसी तरह पभ सब आत्माओं का पिता है। जब वे आत्माएँ एक या दूसरे जीव के रूप में संसार में होती हैं, तो वह प्रत्येक आत्मा को याद करता है, प्रत्येक आत्मा से प्रेम करता है, हर एक का ध्यान रखता है (उसका ध्यान प्रत्येक आत्मा पर होता है)। इस बात का अंदाज़ा लगाना कठिन नहीं है क्योंकि हम जानते हैं कि कुछ माता-पिता के एक से अधिक बच्चे होते हैं और वे प्रत्येक बच्चे से प्रेम करते हैं। प्रभु सदा इन्तज़ार कर रहा है कि आत्मा अपना चेहरा उसकी तरफ करे और उसके पास लौट आए। वह जानता है कि आत्माएँ इस संसार के अनगिनत आकर्षणों में खो गई हैं। वह चाहता है कि वे उसे (प्रभु को) याद करें और अपने घर वापिस आ जाएँ। जीवन में समय-समय पर प्रत्येक आत्मा एक प्रकार की उदासी का, एक अपूर्णता का अनुभव करती है। जब घर वापिस जाने का यह आन्तरिक खिंचाव बहुत तीव्र हो जाता है, तो हम उस अवस्था में पहुँच जाते हैं, जिसे आध्यात्मिक जागृति कहा जाता है।

आन्तरिक ध्वनि की पुकार – जीवन में ऐसे अवसर आते हैं, जब हमारे अन्दर एक धीमी सी आवाज़ हमें बताती है कि इस भौतिक जगत में हम जो कुछ भी जानते। ’ हैं, उससे आगे भी कुछ और है। यह ध्वनि किसी दुर्घटना से, परिवार में किसी की मौत से या किसी भारी नुकसान से जागृत हो सकती है।

(क्रमश:256) (कृपाल आश्रम, अहमदनगर) 

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