आंतरिक बल (भाग – 1)-प्रेम ही जीवन है

प्रेम और काम वासना (अपवित्रता) – अपवित्रता मनुष्य की स्वाभाविक एवं जन्मजात प्रवृति नहीं है। यह सामाजिक जीवन के प्रचलन द्वारा आरोपित है। आज अपवित्रता अर्थात् काम विकार के कारण संसार दुखी है। बूढ़े, बच्चे, जवान तथा हर नर और नारी इस रोग से ही पीड़ित है। समाचार पत्र भरे पड़े हैं। दूरदर्शन एवं इंटरनेट में बहुत गंदगी भरी पड़ी है। अश्लील साहित्य की बाढ़ सी आई हुई है। चारों तरफ हाहाकार मची हुई है। इस रोग को असम्भव मानकर लोग हिम्मत हार चुके हैं। ज्ञानी-ध्यानी भी कहते हैं इस विकार को जीतना मुश्किल है। दुनिया में काम विकार चरम सीमा पर है। यही धर्म ग्लानि का समय है। इसी समय भगवान आकर जन्म लेते हैं तथा नये सतधर्म की स्थापना करते हैं। गायन है कि भगवान ने सत्य धर्म की स्थापना की। वह सत्य धर्म और कुछ नहीं पवित्रता की धारणा ही सत्य धर्म है। दुनिया में असम्भव कोई भी चीज नहीं है। जब तक हमें उस चीज का पूरा ज्ञान नहीं होता तब तक हम उसे असम्भव मानते रहते हैं। ऐसे ही हमें काम विकार अर्थात् अपवित्रता का ज्ञान नहीं है इसलिये हमें काम विकार को जीतने में दिक्कत आती है। अपवित्रता क्यों पैदा होती है। हमारा शरीर कोशिकाओं से बना हुआ है। हमें बल कोशिकाओं से मिलता है। प्रत्येक कोशिका के अन्दर चुम्बकीय बल पैदा होता है। चुम्बक बल कैसे बनाता है इसका पता होना चाहिये । चुम्बक में रेखाओं के रुप में अणु होते हैं ।

(क्रमश:358) (प्रजापिता ब्रम्हाकुमारी ईश्‍वरीय विश्‍व विद्यालय) 

ई- पेपर  बातम्या   आत्मधन  ज्योतिष  वास्तुशास्त्र  संस्कृती  आरोग्य  गृहिणी  पाककला  सौन्दर्य  मुलांचे विश्व  सुविचार  सामान्य ज्ञान   नोकरी विषयीक   प्रॉपर्टी   अर्थकारण   मनोरंजन   तंत्रज्ञान  क्रिडा  पर्यटन  निधनवार्ता   पोल  प्रश्नमंजुषा