अनमोल रत्न (भाग – 1) (शिक्षाप्रद आध्यात्मिक कथाएँ)

कबीर और सर्वाजीत

कबीर साहब बैठे हुए कपड़ा बुन रहे थे, क्योंकि उनका पेशा जुलाहे का था। यह भी एक अजीब बात है कि जुलाहा हर प्रकार के सूत को पहले साफ करवाता है और फिर उसको बुन कर जोड़ देता है । यही कबीर साहिब का Profession (व्यवसाय) था और इसी तरह से, जितनी रूहें उनके पास आती थीं, उन सबकी जन्मों-जन्मों की मैल को साफ करके उन्हें वे प्रभु से जोड़ देते थे। तो वे बाहर भी यही काम करते थे और अन्तर में भी ।

जब ये (सर्वाजीत) वहाँ पहुँचे तो उन्होंने (कबीर साहिब ने) देखा, वे तो दिलों के जानने वाले होते हैं और पूछा, ‘‘महात्मा जी, आप यहॉं कैसे पधारे?’’ उसने (सर्वाजीत ने) कहा कि, ‘‘भई मैं तो तुम्हें जीतने आया हूँ’’, तो कबीर साहब ने कहा, ‘‘आइये पधारिये।’’ उनकी खातिरदारी (आवभगत) की और कहने लगे, ‘‘आप हुक्म कीजिए।’’ जब सर्वाजीत ने कहा, ‘‘आप मेरे साथ शास्त्रार्थ कर लीजिए’’ तो कबीर साहब ने फर्माया, ‘‘आप इतनी महान हस्ती हैं, आप से शास्त्रार्थ क्या करना, आप जो कहेंगे मुझे मंजूर है।’’ सर्वाजीत ने कहा, ‘‘अगर आप को मंजूर है तो लिख दो कि कबीर हारा और सर्वाजीत जीता,’’ कबीर साहिब ने कहा- ‘‘आप खुद लिख दीजिए और मुझसे दस्तखत करा लीजिए, कहीं ऐसा न हो कोई गलती हो जाए।’’ उन्होंने (सर्वाजीत ने) खुद लिखा, कबीर हारा और सर्वाजीत जीता और ये कागज़ लेकर उछलते कूदते, अपनी माँ के पास पहुँचे, इनकी Ego(खुदी) का कोई ठिकाना ही नहीं था ।

(कृपाल आश्रम, अहमदनगर) (क्रमशः 34)

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