‘मेरा’ सुख ‘किसके’ हाथ – हर रोज मन की जाँच करें

कुछ समय पहले मैंने अपने मित्र से किसी मामले पर विचार-विमर्श करने के लिए बात-चीत शुरू की, लेकिन मेरी बात का उत्तर देने की बजाय वह मुझे झुँझलाने लगा। मुझे उसका यह बर्ताव बहुत ही अजीब सा लगा। उसके बाद मैंने उससे बात करना बंद कर दिया। क्योंकि, जिस व्यक्ति ने मेरी बात सुनीभी नहीं और झुंझलाना शुरू कर दिया, तो मैं उससे कैसे बात कर सकता हूँ। फिर मैंने विचार किया कि जो आदमी हमेशा ठीक से बात करता था, वह अचानक ही इतना कैसे बदल सकता है। लेकिन फिर भी पिछली घटना के बारे में विचार करके उससे बात करने का मेरा मन नहीं करता था। एक दिन अचानक रास्ते में मिलने पर साहस जुटाकर मैंने बात शुरू की, तो वह बड विनम्रता से पेश आया तथा अपने पिछले बर्ताव के लिए खेद व्यक्त किया। तभी बातों-बातों में उसने बताया कि उस दिन वह घरेलू मामलों की वजह से काफी परेशान था। इस घटना से मेरी सोच ही बदल गई। हम जब तक अतीत में चिपके रहेंगे तब तक वर्तमान को नहीं पकड़ सकेंगे, और न ही उसमें नए प्रकाश की चमक को महसूस कर सकेंगे। हमारे भीतर जमी हुई अतीत की पीड़ा जब तक स्थान नहीं छोड़ेगी, तब तक नई परिस्थितियॉं, नए अनुभव अपनी जगह नहीं बना पाएँगे। संबंधों में सही और गलत का कोई पैमाना नहीं होता है। हर व्यक्ति अपने-अपने नजरिए से सही होकर दूसरे के नजरिए को समझते है। वास्तव में संबंधों की यही परिभाषा है। अतः वर्तमान को कभी अतीत के कसौटी पर नहीं परखना चाहिए। जीवन में यदि संतुष्टि चाहिए तो हमें शांति, प्रेम व प्रसन्नता जैसे मूल्यों से कभी समझौता नहीं करना चाहिए। जिसके अंदर नफरत है, उसे किसी और दुश्मन की आवश्यकता ही नहीं है। दु:खी होने के लिए एक अकेली नफरत ही काफी है।

(प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय) (क्रमशः 51)

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