व्यक्ति एक व्यक्तित्व अनेक ब्रह्माकुमार भ्राता जगदीश चन्द्र एक जीवन्त जीवन-पथ

माँ सरस्वती प्रसन्न हुई

बाबा ने उनको हर प्रकार की सेवा पर भेजा और हर प्रकार से उनकी रक्षा की । उनके सर पर बाबा का हाथ था, उनका साथ था । बाबा ने उनको ‘संजय’ इसीलिए कहा कि उन्होंने बाबा के ज्ञान को कलियुगी मनुष्यों के समझने लायक बनाया । यह उनका पार्ट रहा । जगदीश भाई उर्दू, पर्शियन, इंग्रेजी, पंजाबी, हिंदी आदि कुल छह भाषायें जानते थे । वे बाबा के राइट हैंड थे । दादियॉं और बहनें भी जगदीश भाई का बहुत रिस्पेक्ट करती थीं । जो काम कोई नहीं कर सकता था, वो काम दादी जी उनको देती थीं । मैंने देखा, उनमें प्लानिंग बुद्धि बहुत थी । एक बार हमने शिमला में प्रदर्शनी लगायी थी । उसमें मुंबई से निर्वैर भाई भी आये थे । वो प्रदर्शनी दिल्ली की तरफ से लगी थी । मेरे को लिटरेचर काउण्टर पर बिठा दिया गया । उस समय किताबों का दाम दो आने, चार आने से ज्यादा नहीं होता था ।

(क्रमश:278) (प्रजापिता ब्रम्हाकुमारी ईश्‍वरीय विश्‍व विद्यालय) 

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