व्यक्ति एक व्यक्तित्व अनेक – ब्रह्माकुमार भ्राता जगदीश चन्द्र एक जीवन्त जीवन-पथ

माँ सरस्वती प्रसन्न हुई

जगदीश भाई आर्टस् पऐ थे लेकिन साइंस में भी उनकी अच्छी पकड थी । उन्होंने एक किताब लिखी थी ‘साइंस एण्ड स्पिरीचुअलिटी’ (विज्ञान एवं अध्यात्म) । इसको पढकर साइंस वाले भी हैरान होते थे । इनकी ‘इंटरनल वर्ल्ड ड्रामा’ (‘अविनाशी विश्‍व नाटक’) पुस्तक साहित्य भौतिकशास्त्र के क्षेत्र में अद्भुत है। जब मैंने कई वैज्ञानिकों और अतिकशास्त्रियों को उसे पढ़ने के लिए दिया तो उन्होंने कहा कि यह जौन-सा महान् भौतिकशास्त्री है जिसने इसको लिखा है! वह किताब लिखकर उन्होंने भौतिकशास्त्र (झहूीळली) को ही बदल दिया। हालांकि वे दिव्यदृष्टि में कभी नहीं गये लेकिन उनकी दिव्यबुद्धि बहुत तेज़ थी। वे हर वक्त सोचते रहते थे। उन्होंने साइंसदानों की कई महफ़िलों में भाषण दिये। उन्होंने ’लॉ ऑफ एन्ट्रोपी’ को सिद्ध किया कि जैसे यह लॉ भौतिकशास्त्र में है ऐसे अध्यात्म में भी है। उन्होंने वैज्ञानिकों के सम्मेलनों में सिद्ध किया कि सतो, रजो और तमो अवस्थायें भौतिकशास्त्र में भी हैं और आध्यात्मिक शास्त्र में भी हैं। मम्मा-बाबा भी उनको बहुत रिस्पेक्ट देते थे बहनों का वे बहुत आदर करते थे। उन्हें वे ’शक्ति’, ’देवी’ समझते थे। मम्मा की बहुत-बहुत रिस्पेक्ट करते थे। जैसे भक्त दुर्गा माता या जगदम्बा को भक्ति भाव से देखते हैं, वैसे जगदीश भाई मम्मा को दुर्गा माता के रूप में देखते थे। बहनों के आगे सिर झुकाकर मिलते थे। जिन्होंने भी उनके साथ सेवा की है वे कर्मठ (हार्डवर्कर) बने और आत्म विश्वासी बने। साथियों में जगदीश भाई ये विशेष गुण भरते थे। बाबा भी उनको बहुत प्यार करते थे।

सन् 1962 में हम दिल्ली में मेजर की कोठी पर गये थे। जगदीश भाई उन दिनों लिख रहे थे भक्ति और ज्ञान में क्या अन्तर है। उनको सर्दी, जुकाम, बुख़ार आये हुए थे। यह समाचार सुनकर बाबा कमला नगर सेन्टर की तीन मंज़िल चढ़कर उनसे मिलने गये था वे आयु में मेरे से छोटे थे लेकिन उनकी बुद्धिमत्ता, कर्मठता, व्यवहार, सेवा के प्रति समर्पण भाव से मैं प्रभावित था। उन के लिए मेरा बहुत रिस्पेक्ट था। महीने में कम से कम तीन बार मैं उनके पास ज़रूर जाता था। एक बार जाता था ’वर्ल्ड रिन्युअल’ मैगज़ीन का मटीरियल (लेखन सामग्री) लेने। पहले मैं उन लेखों को पढ़कर उनमें से कुछ सिलेक्ट करता था, उनको छापें या न छापें, यह पूछने के लिए दूसरी बार जाता था। कंपोज़िंग और प्रूफ रीडिंग के बाद उनको दिखाने के लिए तीसरी बार जाता था। कृष्णा नगर से बस में जाता था। वहॉं पहुँचने के लिए कभीकभी दो बसें भी बदलनी पड़ती थी। जो भी जगदीश भाई ने कहा, मैंने उस आज्ञा का पालन किया क्योंकि उनमें सच्चाई, त्याग और तपस्या का बल था। बाबा की सेवा और बाबा से सम्बन्ध में वे सच्चे थे। वे दिलेर (साहसी) बहुत थे। एक दफ़ा हापुड़ में गड़बड़ हो गयी। एक माता थी रिजू माता। अग्रवाल परिवार की थी। उसका पति पवित्र रहना नहीं चाहता था। पचास साल के ऊपर उनकी उम्र थी। उस व्यक्ति के कारण यह हंगामा हो गया। उसने सेन्टर की बिजली कटवायी, पानी के पाइप कटवाये। वहॉं की बहनों के लिए राशन पहुँचाने जगदीश भाई दिल्ली, कमला नगर से जाते थे। एक दिन उन लोगों ने सोचा कि जब यह बस से उतरेगा, इसके ऊपर ट्रक चढ़ा देंगे। लेकिन उस दिन जगदीश भाई को बाबा की टचिंग हई कि आज पैदल नहीं जाना है, रिक्शे में जाना है। और साथ में पुलिस वालों को ले चलना है। वे बस से उतर कर सीधे पुलिस थाने गये। वहॉं से पुलिस वालों को लेकर, रिक्शे में सेन्टर पर जाकर राशन देकर आये । उन्होंने बताया कि अगर उस दिन पुलिस वाले मेरे साथ नहीं होते, तो वो लोग मेरे ऊपर ट्रक चढा देते ।

(क्रमश:277) (प्रजापिता ब्रम्हाकुमारी ईश्‍वरीय विश्‍व विद्यालय) 

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