आत्मिक शांति की खोज – ‘ज्योति’ व ‘शब्द’ का अनुभव

जो ज्ञान हम इस दुनिया का इकट्ठा करते हैं, वे उसकी बात नहीं कर रहे हैं; यह अपरा-विद्या है। स्वामी जी महाराज हमें यही समझा रहे हैं कि हमें शब्द के साथ जुड़ना है, प्रभु के नाम के साथ जुड़ना है। प्रभु को पाने का रास्ता बुद्धि और विचारों का रास्ता नहीं है। यह रास्ता कैसे पाया जा सकता है, नाम के साथ हम कैसे जुड़ सकते हैं, यही यहॉं स्वामी जी महाराज समझा रहे हैं :

गुरु बिन कभी न उतरे पार

जब तक हम किसी ऐसे गुरु की शरण में नहीं जायेंगे, जो नाम के साथ जुड़ा हो, जो प्रभु के हुक्म से हमें नाम के साथ जोड़ सकता हो, तब तक हम इस दुनिया की दलदल में फँसे रहेंगे। जब आदमी दलदल में फँसा होता है, तो वह दलदल में नीचे की ओर जाता रहता है। जब वह दलदल में फँसता चला जाता है, तो वह हाथ-पैर मारता है, लेकिन जितना वह हाथ-पैर मारता है, उतना ही वह और अधिक धंसता चला है ऐसीही हालत हमारी है। जब हम इस दुनिया में आते हैं तो अपने आपको बेहतर करने के लिए हम बहुत हाथ-पैर मारते हैं। लेकिन हमारे हाथ-पैर सही तरफ़ नहीं उठते और इस दुनिया की दलदल में हम और धंसते चले जाते हैं। इस दलदल से निकलने का एक ही तरीका है कि यदि कोई दलदल से बाहर खड़ा हो और हमें अपना हाथ दे दे, एक लकड़ी पकड़ा दे या एक रस्सी पकड़ा दे और उस सहारे के साथ हमें बाहर खींच ले। इस दुनिया में ऐसा कौन है, जो दलदल से परे है ? स्वामी जी महाराज फ़रमा रहे हैं कि वह एक महापुरुष है, गुरु है। क्योंकि वह स्वयं प्रभु से एकमेक है, इसलिए काल और माया के जाल से बहुत ऊपर है।

वही हमें सहारा देकर इस दलदल से निकाल सकता है; जिस 84 लाख जियाजून में हमारी आत्मा सदियों से भटक रही है, उससे छुटकारा दिला सकता है। जिस रास्ते की स्वामी जी महाराज बात कर रहे हैं, वह शब्द से जुड़ने का है। बहुत से महापुरुषों ने इस रास्ते के बारे में हमें समझाया है। संत दर्शनसिंह जी महाराज ने एक शेर में फ़रमाया है :

गुरु मिले तो मुहब्बत के राज़ खुलते हैं निजात मिलती है सारे गुनाह धुलते हैं

हमारी आत्मा एक योनि से दूसरी, दूसरी से तीसरी योनि में भटक रही है। उस पर कर्मों के धब्बे पड़े हुए हैं, गुनाहों के धब्बे हैं, हर एक विचार, हर एक बोल, हर एक कार्य का हमें भुगतान करना है। जब हम गुरु की शरण में आते हैं, तो सारे गुनाह धुल जाते हैं क्योंकि वे हमें इन गुनाहों को साफ़ करने का तरीका बता देते हैं। नामदान के दिन वे हमारे संचित कर्मों को अपने ऊपर ले लेते हैं, उनका नाश हो जाता है। प्रभु को पाने का रास्ता दिमाग का नहीं है, यह प्यार का रास्ता है, मुहब्बत का रास्ता है। ऐसे महापुरुष हमें प्यार करना सिखा देते हैं। संत दर्शनसिंह जी महाराज ने एक शेर में फ़रमाया है

(क्रमश:169) (कृपाल आश्रम, अहमदनगर) 

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