व्यक्ति एक व्यक्तित्व अनेक – ब्रह्माकुमार भ्राता जगदीश चन्द्र एक जीवन्त जीवन-पथ

मॉं सरस्वती प्रसन्न हुई

भ्राता जगदीश जी की अंग्रेज़ी किताबों की प्रूफ रीडिंग करने वाले और अंग्रेज़ी मैगज़ीन ’दि वर्ल्ड रिन्युअल’ के सह-सम्पादक, कुरुक्षेत्र के ब्रह्माकुमार भ्राता लक्ष्मण जी ने, जगदीश भाई साहब के साथ के अपने अनुभव इस प्रकार सुनाये हैं_दिल्ली में इन्होंने टीचर्स ट्रेनिंग की। डॉ ज़ाकीर हुसैन, जो बाद में भारत के तृतीय राष्ट्रपति बने, वे इनके प्रिन्सीपल थे और उन्होंने इनको पढ़ाया भी था। इन्होंने बी.एड. सन् 1951 में की और मैंने सन् 1952 में की क्योंकि डिग्री के बाद मैंने एक साल नौकरी की।ह् जगदीश भाई के पिता जी नहीं चाहते थे कि जगदीश भाई ज्ञान में चलें। वे चाहते थे कि ये नौकरी करें। जब जगदीश भाई ने नौकरी छोड़ी और सेन्टर पर रहने के लिए तैयार हुए तो उनके पिता जी इनको डॉ. ज़ाकीर हुसैन जी के पास ले गये समझाने के लिए। उस समय वे भारत के उपराष्ट्रपति थे। ज़ाकीर हुसैन जी ने जगदीश भाई से कहा, तुम वहॉं जाना छोड़ दो, तुमको मैं आई.ए.एस. करवा देता हूँ। कलेक्टर की नौकरी दिला देता हूँ लेकिन जगदीश भाई ने नहीं माना। उन्होंने कहा, मुझे कुछ नहीं चाहिए, जो चाहिए वो मिल गया है। ज्ञान में आने के बाद जब उनको देखा तो मुझे ये तीन विशेषतायें उनमें नज़र आयीं- एक, स्वयं की पहचान, दूसरी, बाप परमात्मा की पहचान और तीसरी, समय की पहचान। इन तीनों को उन्होंने अच्छी तरह पहचाना था इसलिए इन तीनों को वे बहुत महत्व देते थे। वे हर वन की याद में रहते थे। उनमें अलौकिकता बहुत थी। हर बात वे ज्ञानयका बोलते थे। एक बार करनाल में प्रदर्शनी लगी हुई थी। वे भी आये थे। रात को जब सोने लगे तो रजाई ओढ़ते उन्होंने कहा कि चलो भाई, अब कब दाख़िल होना है। वे गंभीर भी उतने ही थे और हंसमुख भी उतने ही थे। कार्य करने में उनको अपने में बहुत विश्वास था। दूसरों को भी वे ऐसे ही बनाने की कोशिश करते थे और बनाते भी थे।

ज्ञानामृत पत्रिका का नाम पहले ’त्रिमूर्ति’ था, छपवाने के लिए काग़ज़ के बंडल कंधे पर रखकर छापेखाने में ले जाते थे। लोग इनको देखकर हँसते थे कि देखो यह ज्ञानामृत का संपादक क्या कर रहा है! पत्रिका छपने तक लेखों को लिखते ही रहते थे और करेक्शन करते ही रहते थे। उनकी बुद्धि और नज़र इतनी तेज़ थी कि पुस्तक या मैगज़ीन की ग़लतियॉं जहॉं होती थीं वहीं नज़र जाती थी। एक बार मुझे जिम्मा दिया, हिन्दी और अंग्रेज़ी मैगज़ीन छपवाने का। मैगज़ीन छप चुकी थी लेकिन जगदीश भाई ने उसकी ग़लती निकाल कर सुधारने के लिए कहा। प्रेस में जो कंपोज़र था, वो हँस पड़ा। कहता है, एक ऐसा भी संपादक है जो मैटर छपने के बाद भी ग़लतियॉं निकाल कर ले आता है करेक्शन के लिए।

(क्रमश:275) (प्रजापिता ब्रम्हाकुमारी ईश्‍वरीय विश्‍व विद्यालय)

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