आत्मिक शांति की खोज – ‘ज्योति’ व ‘शब्द’ का अनुभव

धाराओं को समेटते हैं। सुरत की धारा के द्वारा हमें इस शरीर की अनुभूति रहती है। इसी के द्वारा हमारी इंद्रियॉं काम करती हैं, हम सन सकते हैं, देख सकते हैं, सूंघ सकते हैं, स्पर्श महसूस कर सकते हैं तथा स्वाद ले सकते हैं। इंद्रियों के द्वारा ही हम मनमोहक दृश्यों का लुत्फ उठाते हैं, मधुर संगीत सुनते हैं, स्वादिष्ट भोजन का आनन्द लेते हैं, मनमोहक खुशबू सूंघते हैं और प्रिय स्पर्श का अनुभव पाते हैं। अगर हम अपनी सुरत की धाराओं को बाहरी संसार से हटाकर शिव-नेत्र पर एकाग्र कर लें, तो हम आंतरिक आँख एवं कान से देखने और सुनने लगेंगे और अंतर के मंडलों में जाने लगेंगे।

यह क्रिया ठीक उसी प्रकार होती है, जैसी मृत्यु के समय होती है। जब किसी व्यक्ति की मृत्यु होती है, तो सर्वप्रथम उसके पैरों के तलवा में शून्यता (सुन्नपना) आती है, फिर टांगों से होती हुई ऊपर की ओर बढ़ती है। अंत में कंठ एवं जीभ को पार कर आत्मा शिव-नेत्र पर सिमट जाती है। इस समय हम देखते हैं कि आँखों की पुतलियॉं पहले ऊपर का ओर पलटती हैं, फिर ये नीचे की तरफ हो जाती हैं। इस प्रकार आला शरीर से बाहर निकल जाती है। ऐसे ही, ध्यान-अभ्यास के समय अपनी आत्मा को एकाग्र कर दो आँखों के बीच में ले आते हैं, । दसवॉं-द्वार या शिव-नेत्र कहते हैं। यहीं पर आकर हम अदर रोशनी एवं ’शब्द’ को सुन सकते हैं। दसवॉं- द्वार शरीर का सबसे ऊँचा चक्र है। मृत्यु के समय आत्मा इसी चक्र से शरीर को छोड़ती है। हमारे हुजूरे पुरनूर, संत कृपालसिंह जी एवं संत दर्शनसिंह जी बताया करते थे कि यही जीते-जी मरने की विद्या है। जो दसवें-द्वार से ऊपर जाता है, वह रोज़ मरता तथा जीवित होता है।

शरीर में छ: चक्र विद्यमान हैं। सबसे नीचे का चक्र गुदा-चक्र कहलाता है, जो रीढ़ की हड्डी के सबसे निचले भाग में स्थित है। इंद्री-चक्र दूसरा चक्र है, जो प्रजनन अंगों के निकट स्थित है। तीसरा नाभि-चक्र होता है, जो नाभि के पास स्थित है। चौथा हृदय-चक्र है, जो दिल के पास स्थित है। पॉंचवॉं कंठ-चक्र है, जो हमारे गले के पास स्थित है और छठा, जो दो आँखों के मध्य में स्थित है, जिसे आज्ञा चक्र के नाम से जाना जाता है। इसे ही दसवॉं-द्वार या शिव-नेत्र कहा जाता है। जब आत्मा शरीर को त्यागती है, तो उसे इन छ: चक्रों से क्रमवार गुज़रना पड़ता है। इसी प्रकार, अगर हम ध्यान-अभ्यास सबसे निचले चक्र से शुरू करेंगे, तो हमारी आत्मा को इन सभी चक्रों से होकर ऊपर आना होगा। आज के युग में, जबकि हमारा जीवन बहुत छोटा है और हमारे पास समय बहुत कम है, तो क्यों हम इतने कीमती समय को एक के बाद एक, सारे चक्रों को पार करने में लगायें, जबकि हम उसी समय में सीधे, सबसे ऊँचे चक्र पर ध्यान टिका सकते हैं। इसलिए हम सीधे शिव-नेत्र या दसवें-द्वार पर अपना ध्यान टिकाएँ, ताकि हम अपनी मंज़िल पर तेजी से पहुंच सकें॥ ध्यान-अभ्यास वास्तव में एकाग्रता का रास्ता है। इसके लिए किसी ख़ास आसन या मुद्रा की या कोई कसरत करने की ज़रूरत नहीं है। ध्यान टिकाने का यह तरीका इतना सीधा एवं सरल हैं कि इसे बच्चे, बूढ़े, जवान, लड़की, स्त्री, स्वस्थ या बीमार, सभी कर सकते हैं। इसके लिए पढ़ा-लिखा या ताकतवर होना भी आवश्यक नहीं है। हर इंसान ध्यान-अभ्यास के द्वारा आंतरिक मंडलों में प्रवेश कर सकता है।

शांति से बैठिये और अपने आपकी ओर ध्यान दीजिए । क्या आप अपने शरीर के प्रति जागरूक हैं? क्या आप अपने आस-पास क वातावरण की जानकारी रखते हैं? क्या आप दूसरे लोगों के बारे में जागरूक हैं? क्या आपको अपने विचारों की जानकारी है? अपने शरीर, अपने वातावरण एवं अपने विचारों की जानकारी को शारीरिक या भौतिक चेतनता कहते हैं। इसके बाद दुबारा शांति से बैठिए और अपना ध्यान दसवें-द्वार पर एकाग्र कीजिए। अपनी पूरी तवज्जोह को यहॉं पर टिकाकर रखें। हमें अपने शरीर,वातावरण और विचारों का कोई ख्याल नहीं रहना चाहिए। देखिये, कितनी देर तक आप अपने मन विभिन्न विचारों के चंगल से दूर रख पाते हैं। यह ध्यान-अभ्यास या एकाग्रता का प्रथम चरण है। यह वह तरीका है, जिसके द्वारा आप अपना ध्यान चारों ओर से हटकार शिव-नेत्र पर एकाग्र करते हैं। अगले अध्याय में आप, ध्यान-अभ्यास की विधि की जानकारी हासिल करेंगे।

(क्रमश:168) (कृपाल आश्रम, अहमदनगर)

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