अनमोल रत्न (भाग – 1) (शिक्षाप्रद आध्यात्मिक कथाएँ)

हमें प्रभु में विश्‍वास नहीं

एक आदमी की कहानी है जो बूंखार शेर से बचकर भाग रहा था। भागते-भागते वह एक खड़ी चट्टान पर पहुँच गया जहॉं से आगे भागना संभव नहीं था। उसने नीचे एक शाखा देखी, तो कूदकर उसे पकड़ने के अलावा उसे शेर से बचने का कोई चारा नज़र नहीं आया। उसे भरोसा था कि जब तक शेर नहीं जायेगा, वह उस शाखा से लटका रहेगा। पर वह भयभीत हो उठा जब उसने देखा कि एक छोटा चूहा उस शाखा को काट रहा था। उसने नीचे देखा तो घाटी हजारों फुट नीचे थी। ऊपर शेर था और नीचे घाटी उसे कुछ नहीं सूझा तो वह परमात्मा से मदद के लिए प्रार्थना करने लगा; उसने याचना की, आप जो भी कहेंगे, मैं वहीं करूंगा. कृपया आप मेरी सहायता करें। वह आदमी प्रभु की आवाज सुनकर हैरान हो गया। प्रभु ने कहा तुम वहीं करोगे जो मैं कहूँगा?

हॉं, प्रभु मुझे बचा लीजिए। प्रभु ने कहा, तथास्तु, इस शाखा को छोड़ दो, मैं तुम्हें बचा लूँगा। उस आदमी ने एक क्षण के लिए सोचा और बोला, क्या वहॉं ऊपर आपके अलावा कोई और भी है, जिससे मैं बात कर सकता हूँ? हम भी चाहते हैं कि परमात्मा हमें बचा ले, पर हम उस पर कुछ छोड़ना नहीं चाहते और न ही उसमें विश्वास रखते हैं। हमें चाहिए कि हम अपना अहंकार और चतुराई छोड़ दें और अपने सत्गुरु में पूर्ण विश्वास रखें, उनका कहना मानें, यही सफलता की कुंजी है।

(कृपाल आश्रम, अहमदनगर)(क्रमशः 116)

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