व्यक्ति एक व्यक्तित्व अनेक – ब्रह्माकुमार भ्राता जगदीश चन्द्र एक जीवन्त जीवन-पथ

उस समय बाबा ने मुझे पहले-पहले उनके पास कमला नगर भेजा था । आप जानते हैं, दिल्ली तो बहुत बडा शहर है । भ्राता जी खुद मुझे घुमाने ले गये और हमारे काम जहॉं-जहॉं होते थे, उन सब स्थानों का अवलोकन कराया, जैसे कि ब्लॉक बनने का स्थान, पेपर मिलने का स्थान, प्रिंट होने का स्थान इत्यादि । उस समय उनका हृदय-पुष्ट शरीर था, लम्बी-लम्बी टॉंगें, भुजायें, छ:फुट का कद था । वे चलते थे तो मैं भागता था । इतनी उनकी चलने की रफ्तार थी । चालीस वर्ष पहले वे कैसे थे और चालीस वर्ष बाद आज वे कैसे हैं ! इन चालीस वर्षों में उन्होंने कितने कार्य किये हैं ! जाना तो हम सभी को है, आज नहीं तो कल । सबको एक दिन शरीर को छोडना ही है लेकिन उन्होंने अपने शरीर के रोम-रोम को, एक-एक हड्डी को सेवा में लगाया । एक बार वे मेरे से कह रहे थे कि जब वे शुरू-शुरू में आये थे तब उनको देखकर मम्मा ने कहा था कि अगर आप इसी रीति से पुरुषार्थ करते रहोगे तो नम्बर वन में आओगे।’ लेकिन उन पर सेवा की बड़ी जिम्मेवारी थी। उन्होंने न केवल साहित्य की सेवा की बल्कि प्रशासनिक सेवा भी बहुत की। यज्ञ में आने वाले तरह-तरह के विघ्नों, परिस्थितियों का सामना करने में, सुलझाने में ही उनका ज़्यादा समय गया। फिर उनका पुरुषार्थ बहुत ज़बरदस्त था। उन्होंने कभी न मान चाहा, न स्थान, न सुख, न वैभव।

जीवन भर बाबा की सेवा में लगे रहे, लगे ही रहे। एक विशेष बात उनमें यह थी कि वे यज्ञ के किसी भी नुकसान को, व्यर्थ व्यय को सहन नहीं कर सकते थे। वे पुस्तकों, लेखों, अनुभवों के रूप में इतना ज्ञान खज़ाना हमें प्रदान करके गये हैं कि आगे के समय में हम उनसे लाभान्वित होते रहेंगे। उनके द्वारा निर्मित ईश्वरीय संविधान, उनका स्वयं का नष्टोमोहा स्मृतिर्लब्धा स्वरूप, ईश्वरीय नियम, धारणाओं में अचल-अडोल जीवन हमें सदा प्रेरित करता रहेगा। अन्तिम श्वास तक उनको स्वयं से एक ही गिला रहा कि मैं शिव बाबा को सम्पूर्ण जगत में प्रत्यक्ष नहीं कर पाया। सच्चे स्नेही के रूप में अब हम उनकी प्रत्यक्षता की इस शुभ आशा की पूर्णता का दृढ़ संकल्प करें और उसमें जी-जान से जुट जायें।

(क्रमश:274) (प्रजापिता ब्रम्हाकुमारी ईश्‍वरीय विश्‍व विद्यालय)

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