अनमोल रत्न (भाग – 1) – बाबा जी का रहमोकरम

मेरी आदत थी कि मेरा घोड़ा सरपट दौड़ता चला जा रहा हो, तो मैं उसे खड़ा किये बगैर, उसकी गर्दन के बाल पकड़, कूद कर उस की पीठ पर सवार हो जाता था। एक दिन नौकर ने मेरी अनुपस्थिति में, मुझे बताये बिना, घोड़े के बाल काट डाले। मुझे इसका कोई ख्याल न था। मैंने घोड़े की गरदन पर हाथ बढ़ाया तो हाथ फिसल गया। मैं नीचे गिर गया और मेरी टाँग टूट गई। दर्द तो हुआ सो हुआ, सब से बड़ी तकलीफ यह थी कि चोट के कारण टट्टी-पेशाब भी बन्द हो गया। डाक्टर तो मेरी ज़िन्दगी से भी निराश हो गये।

एक मुसलमान ओवरसीयर, जो मेरे जिले का था, उसे इस दुर्घटना का पता चला तो वह मेरे पास आया और कहने लगा, हम एक ही जिले के हैं, अतः आप मुझे घर का ही आदमी समझिये। कहिये मैं आपकी क्या सेवा कर सकता हूँ? मैंने कहा, यहाँ से 8 मील दूर मेरे बच्चों का स्कूल है और वे वहीं स्कूल के बोर्डिंग में रहते हैं। मैं नहीं चाहता कि उन्हें इस दुर्घटना की खबर पहुँचे। हॉं, मैं इतनी दरखास्त जरूर करूंगा कि आप बाबा जी (बाबा जयमल सिंह जी महाराज) को तार दे दें। उसने तार दे दी । बाबा जी को तार मिला तो कहने लगे, अच्छा! सतगुरु दयाल की यही मर्जी है तो वे उसे ले जायें। नाम तो उसे मिल ही गया है। लेकिन बीबी रुक्को ने बाबा जी से मेरी सिफारिश की।

बाबा जी का यह नियम था कि जब भी कोई खास बात होती तो वे भजन पर बैठ जाते थे और फिर अन्तर में जो सूचना मिलती, भजन के बाद उसे प्रकट कर देते थे। वे शाम को 8 बजे या शायद इस से पहले (जैसे ही उन्हें तार मिली) भजन पर बैठ गये। सुबह तीन बजे के करीब आसन से उठे और बीबी रुक्को को आवाज़ दी। खाना ले आऊँ ? बीबी रुक्को ने पूछा (बाबा जी ने शाम को खाना नहीं खाया था)। बाबा जी ने कहा, नहीं, खाना नहीं चाहिये। तुमने बाबू सावनसिंह के बारे में पूछा था। बाबू सावन सिंह को बता दो कि वह अब नहीं जा रहा, पर कर्म बड़े भारी थे। उसे पाँच वर्ष तक का दु: भोगना था, लेकिन अब हम पाँच महीनों में ही कर्मों का भुगतान कर देंगे। अभी हम उसके पास नहीं जायेंगे। जब वह अस्पताल से बाहर आएगा, उस वक्त हम उसे मिलेंगे। अलबत्ता तुम उसे तार का जवाब दे दो। जैसे ही बाबा जी की तार मेरे पास पहुँची, मेरी तबियत तेजी से सुधरने लगी।

(कृपाल आश्रम, अहमदनगर)

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