अनमोल रत्न (भाग – 1) – 119. परमात्मा की तारीफ नहीं की जा सकती

मेरी शुरू से यह आदत रही है कि मैं एक बात की पूरी तरह खोज करके उसकी तह तक पहुँचता हूँ । मैं नवीं जमात में पढ़ता था तो मैंने एक मर्तबा अपने उस्ताद से, जो पादरी थे, पूछा, लोग महात्माओं और महापुरुषों के आगे बड़े विशेषण लगाते हैं, जैसे श्री महाराज 108 वगैरह. और आप अपने पैगम्बर को सिर्फ ईसा कहते हैं, इसका क्या मतलब है? उन्होंने मेरे सवाल का बड़ा उमदा जवाब दिया ।

कहने लगे- परमात्मा जो सबसे बड़ा है और सबका खालिक और मालिक है, उसके नाम के साथ भी हमने कभी कोई अल्काब (उपाधि) लगाया है? कभी किसी को हज़रत खुदा या श्री हजूर परमात्मा जी महाराज कहते सुना है? मसीह को हम खुदा का बेटा मानते हैं, खुदा के नाम के साथ कोई खिताब या अल्काब नहीं लगाया जाता, तो मसीह के नाम के साथ कैसे लगाया जा सकता है? जैसे परमात्मा की कोई तारीफ़ नहीं की जा सकती, इसी तरह उन महापुरुषों की भी कोई क्या तारीफ़ कर सकता है जो मालिक में अभेद हो गये, हम उनकी महिमा क्या जान सकते हैं ।

(कृपाल आश्रम, अहमदनगर)

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