अनमोल रत्न (भाग – 1) – पहले लक्ष्य निर्धारित करो

मैंने जब स्कूल की पढ़ाई खत्म की तो मेरे मन में बड़ी महत्वाकांक्षायें थीं । मुझे किताबें पढ़ने का शौक था । मैं चाहता था कि मेरे पास बहुत बड़ा पुस्तकालय हो, अध्ययन तथा ज्ञान प्राप्ति के साधन हों, यह हो, वो हो लेकिन मुझे अपना लक्ष्य तय करना था कि जीवन में मुझे क्या करना है । सांसारिक जीवन की महत्वाकांक्षाओं को पूरा करना है या प्रभु को पाना है, जो मानव जीवन का परम लक्ष्य और उद्देश्य है । इस सवाल को हल करने में एक हफ्ते से ज्यादा समय लग गया। मैं शाम के वक्त किसी एकांत स्थान पर चला जाता, मेरे सामने जो सवाल था, उसके सारे पहलुओं पर विचार करता । इस सोच में रात के दो, तीन, चार बज जाते, कई बार सुबह हो जाती । पूरे सोच-विचार के बाद मैं इस नतीजे पर पहुँचा कि मेरे लिये प्रभु पहले है, दुनिया बाद में उसके बाद से मैं उस लक्ष्य की ओर कदम-कदम आगे बढ़ रहा हूँ ।

अगर आप अपना लक्ष्य निश्चित कर लें तो हर कदम जो आप उठायेंगे, आपको अपनी मंजिल के करीब ले जायेगा । इस वक्त (लक्ष्यहीनता के कारण) आपकी यह हालत है कि दो कदम आगे बढ़ गये, फिर पीछे हट गए, फिर आगे बढ़ गये । पानी हासिल करने के लिये पहले एक जगह खुदाई की, फिर किसी और जगह जमीन खोदी, दो फुट गड्ढा यहॉं खोदा, तीन फुट वहॉं, चार फुट वहॉं जगह-जगह गड्ढे खोदते चले गये- पानी कहॉं से निकले? अगर किसी एक जगह ही खुदाई करते जाते, जहॉं आपको पता है, कि नीचे पानी है, तो कब का पानी निकल चुका होता । तो अपना कोई सुनिश्चित लक्ष्य तय करो कि जीवन में तुम क्या बनना, क्या पाना चाहते हो? फिर पक्के इरादे और दृढ़ता के साथ उस लक्ष्य की प्राप्ति का प्रयत्न करो । उ

सके साथ जीवन की पवित्रता बहुत जरूरी चीज़ है । ये तीन चीजें जरूरी हैं, सफलता के लिये, निश्चित लक्ष्य, मजबूत इरादा और जीवन की पवित्रता- मैंने जीवन में जो भी सीखा और पाया है, यह उसका सार-तत्व मैं पेश कर रहा हूँ। ये मेरे निजी अनुभव की बातें हैं, मैं खुद इन सभी स्थितियों से गुजरा हूँ ।

(कृपाल आश्रम, अहमदनगर)