सच्चा सुख (शिक्षाप्रद आध्यात्मिक कथाएँ) – भक्ती की भावना

आप सब जानते हैं कि कबीर साहिब ने ‘संत- मत’ की शुरूआत की । थी और उन्होंने संत-मत के बारे में, ‘सुरत-शब्द योग’ के बारे में, आत्मा और परमात्मा के मिलाप के बारे में, अपनी वाणी द्वारा बहुत कुछ लिखा है। कबीर साहिब स्वयं प्रभु से एकमेक थे। अपने अनुभव के आधार पर ही उन्होंने अपनी वाणी रची है। कबीर साहिब ने अपनी वाणी द्वारा दुनिया के लोगों को, जो अपने आपको भूल चुके हैं, दुनिया में ही हँस कर रह गए हैं, समझाने की कोशिश की है कि कैसे हम अपने सही रूप को जान सकते हैं। यहॉं इस शब्द में कबीर साहिब फरमा रहे हैं :

जाग पियारी अब का सोवै ।

रैन गई दिन काहे को खोवै॥ इस शब्द में वे हमारी आत्मा को पुकार रहे हैं, वह आत्मा जो सोई पड़ी है, प्रभु से बहुत दूर है, अँधेरे में पड़ी हुई है। उसकी यह । हालत इसलिए बन गई क्योंकि वह प्रभु के नूर से खाली है। हमारी आत्मा के ऊपर माया के कई परदे पड़े हुए हैं और प्रभु से दूर होने के कारण वह अपने आप को भूल चुकी है। संत कबीर सहिब यही पुकार आत्मा से कर रहे हैं कि वह जागे, ताकि हम उस अवस्था में पहुँचे, जो रोशन है।

जब इंसान सोता है, तो उसे कुछ मालूम नहीं होता कि उसके आस-पास क्या हो रहा है। वह बेखबर रहता है, उसे कुछ होश नहीं रहता। आत्मा की नींद क्या है और आत्मा की नींद किस लिए है, इसके बारे में संत-महात्मा हमें सम झाते चले आए हैं कि काम, क्रोध, मोह, लोभ और अहंकार के कारण ही हम अपने आपको भूल चुके है। हम इन्द्रियों के घाट पर जी रहे हैं और हमारा ध्यान उन चीजों में लगा हुआ है, जो माया की हैं। हम सबका ध्यान इसी दुनिया में लगा रहता है |

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