सच्चा सुख (शिक्षाप्रद आध्यात्मिक कथाएँ) – प्रेम की भावना

तो अपने आपको एक नए रूप में देखना शुरू कर देते हैं। यह रूप प्रभु के प्रेम से भरपूर है। जब हम अंतर में प्रभु की सत्ता से जुड़ जाते हैं, तो बाहर की दुनिया का हम पर कोई असर नहीं होता। कर्मों का भुगतान तो हमने करना है। लेकिन हम इस दुनिया में जीते हुए एक detached life (बैरागी जीवन) जीना शुरू कर देते हैं।

प्रभु से जुड़ने पर हम दुनिया से हटते जाते हैं, हम शांत हो जाते हैं, सदा खुश रहते हैं, हमारे अंदर खुशियों के फुव्वारे निकलने लगते हैं। उस अवस्था में पहुँचने के लिए, जिसमें कि हमें प्रभु के दर्शन हो जायें, हम उसकी ज्योति और शब्द के साथ जुड़ जायें, संत रविदास जी महाराज प्रभु से प्रार्थना कर रहे हैं कि हम लोग जो इस दुनिया में भटक गए हैं, ये महापुरुष हम पर इतनी दया-मेहर करें कि हम अपना ध्यान प्रभु की ओर करें।

जब हम अपना ध्यान परमात्मा की ओर करेंगे, तो प्रभु कोई न कोई रास्ता दिखायेगा, जो हमारे लिए बेहतर होगा, जिससे हम अपने आप को जान सकेंगे और परमात्मा से एकमेक हो सकेंगे। जिसको देखा नहीं, उससे प्रेम करने की बात करना, शेख चिल्ली की कहानी है।

वास्तविकता यह है कि जो प्रेम शरीर से प्रारंभ होकर आत्मा की सर्वोच्च स्थिति तक पहुँच जाए, वह सुच्चा प्रेम है, और जो प्रेम शरीर से प्रारंभ होकर शरीर तक ही सीमित रह जाए, वह प्रेम नहीं वासना है। संतों का प्रेम सच्चा प्रेम है, जो सत्गुरु के दर्शन से प्रारंभ होकर उसके विशाल स्वरूप, सत्पुरुष में समा जाता है। एक कवि ने कहा है : मुहब्बत के लिए कुछ खास दिल मसूस होते हैं। ये वो नग्मा है जो हर साज़ पर गाया नहीं जाता इसका उत्तर देते हुए संत दर्शनसिंह जी महाराज फ़रमाते है : शर्त दिल से दिल और जां से जां मिले अक्सर मिले वो राह में, लेकिन कहॉं मिले|

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