अनमोल रत्न (शिक्षाप्रद आध्यात्मिक कथाएँ) – गुरु शिष्य की सँभाल करता है

मैं एक देहाती भाई का जिक्र कर रहा था । वह एक छोटा सा काश्तकार, एक किसान था । अपने छोटे से खेत में उसने तरबूज बो रखे थे । तरबूज की। फसल पककर तैयार हो चुकी थी, मगर अभी कटी नहीं थी । किसान ने सोचा कि शाम को चुकी है, सुबह तरबूज़ तोड़ कर मंडी में ले जाकर बेच देंगे। जाते समय उसने कहा, सत्गुरु मालिक है, और फसल को सत्गुरु के संरक्षण में छोड़ कर चला गया । रात को पॉंच-छ: चोर खेत में घुस आए और तरबूज तोड़कर एक जगह इकट्टे कर लिए, मगर उन्हें साथ न ले जा सके ।

हुआ यह कि ज्योंही वे एक-एक तरबूज़ उठा कर चलने को हुए, तभी एक ही शक्ल के छः सरदार लाठी हाथ में लिए हुए आ पहुँचे और एक-एक चोर को डंडे मार-मार कर वहॉं से भगा दिया । चोरों को हैरानी इस बात की थी कि मारने वाले सभी एक ही शक्ले के थे । उनके दिल में ऐसी दहशत बैठी कि घर लौटते ही सब के सब बीमार पड़ गए । चोरों के मन में यह बात बैठ गयी कि जब तक वे जाकर किसान से क्षमा नहीं मॉंगेंगे, उनका बुखार नहीं टूटेगा । वे किसान के पास गए और अपना अपराध स्वीकार करते हुए उस से मॉंफी मॉंगी । किसान ने सारी बात सुनकर कहा कि मेरे खेत की रक्षा करने वाले मेरे गुरुदेव थे । माफी मॉंगनी है तो उनसे मॉंगो । गुरु हर तरह से शिष्य की संभाल करता है, बाहरी दुनिया में भी और अन्तरीय मंडलों में भी  ।

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