अनमोल रत्न (शिक्षाप्रद आध्यात्मिक कथाएँ) – तन से भी सेवा करो

मुझे याद है, एक बार डेरे (डेरा बाबा जयमलसिंह ब्यास, जिला अमृतसर) में, उन दिनों बोरियॉं बड़ी होती थीं । आजकल तो शायद छोटी होती हैं, तब ढाई-तीन मन की बोरी होती थी । सारे उठाकर कमर पर ले जा रहे थे, मैं कमर पर उठाकर चल दिया (एक बोरी) जो पढ़े लिखे बाबू थे, कहने लगे, ये तुम्हारी डयूटी नहीं है भाई, तुम्हारा काम नहीं है, छोड़ दो ।

मैंने कहा, मैं पहले गधा हूँ- I must bear the burden. I am animal first दिमागी काम मेरा ठीक है, पर शरीर से भी काम करना चाहिए । बात समझ रहे हो? आज से ही यह बात पल्ले बॉंध लो । चपरासी हो या head worker (मुखिया) हो – We are all servents हम सब सेवादार हैं । मैं भी सेवादार हूँ । मैंने कभी आपको हुक्म दिया है? क्यों भई ? प्यार से समझाया है, induce किया है (अर्थात् प्रेरणा दी) तो आज यह मेहरबानी आप कर सकोगे कि आज से ज़बान मीठी रखो ? घर में भी लड़ाई है । ज़बान मीठी न होने से झगड़े हो रहे हैं, बच्चे खराब हो रहे हैं, नमूने बुरे बन रहे हैं ।

माता-पिता को लड़ते देखते हैं, बच्चे नकले करते हैं । क्यों भई, मैं उम्मीद कर सकता हूँ कि आज से यह बात आप लोग करोगे? Make it a point (तय कर लो भई) ज़बान मीठी रखो । किसी का कसूर है तो प्यार से उसे समझा दो, प्लेग के चूहे की तरह उसको फैलाओ नहीं । (तो इस बात पर अमल) करो । आज ही से करो । हमारा आश्रम स्वर्ग बन जाए ।

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