सच्चा सुख (शिक्षाप्रद आध्यात्मिक कथाएँ) – तीन ताप

जब से यह संसार बना है, जीव को शारीरिक, मानसिक और आत्मिक ताप (दुःख) सहन करने पड़ रहे हैं । जीव जन्म- मरण के चक्कर में अनंत बार आया और फिर नया चोला बदल लिया । मानव देह इसीलिए सर्वोतम है कि इसमें हम किसी संत-सत्गुरु के चरणों में जाकर उसका सत्संग कर सकते हैं, उसकी शरण में जा सकते हैं ।

सत्संग की प्राप्ति से हममें विवेक जागृत होता है । सत्गुरू की महिमा लिखते हुए संत दर्शनसिंहजी महाराज फ़रमाते जुनूने-ज़िन्दगी में जो खिरद को मुंतकिल कर दे वही तो मर्दे-मोमिन की निगाहे-नाज़ होती है ‘मताओ नूर’, ग़ज़लख़िरद यानी चतुराई, जो स्वार्थ को ही सब कुछ समझे, शरीर और उसके नश्वर साजो-सामान को ही सब कुछ समझे । ’जुनूने ज़िन्दगी’ दूसरों के लिए जीने वाले; ’मर्दै मोमिन या’नी पूर्ण पुरुष, पूर्ण सत्गुरु जिसने आत्म ज्ञान प्राप्तकर परमात्मा का साक्षात्कार कर लिया है । ’निगाहें नाज़’ यानी वह मस्त नज़र, जो आत्मिक उभार देती है । इसीलिए कहा निगाहे मर्दे

मोमिन से बदल जाती हैं तक़दीरें

वाणी : गुरू अर्जनदेव जी
ताती वाउ न लगई
परब्रहम सरणाई ॥
चउगिरद हमारै रामकार
दुखु लगै न भाई ॥
सतिगुरू पूरा भेटिआ
जिनि बणत बणाई ॥
राम नामु अउखधु दीआ
एका लिव लाई ॥
राखि लीए तिनि रखनहारि
सभ बिआधि मिटाई ॥
कहु नानक किरपा भई प्रभ भए सहाई ॥

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