सच्चा सुख (शिक्षाप्रद आध्यात्मिक कथाएँ) – प्रभु-मिलन

जून के तीसरे रविवार का दिन बाहरी मुल्कों में Fathers’ Day (पिता-दिवस) के नाम से मनाया जाता है । इस दिन हम अपने पिता का सम्मान करते हैं । यह त्योहार पश्चिम में 1905 में शुरू हुआ था । विदेशों में Mothers’ Day (’माता-दिवस’) भी मनाया जाता है । मई के दूसरे रविवार के दिन Mothers’ Day मनाते हैं । इस दिन अपनी माताओं का सम्मान करते हैं, उन्हें तोहफ़ा देते हैं । जून के तीसरे रविवार को Fathers’ Day मनाया जाता है ।

इसी नमूने पर संत दर्शनसिंह जी महाराज ने जुलाई के चौथे रविवार को Masters’ Day (’गुरु दिवस’) कह कर मनाना शुरू किया, जिसमें हम अपने गुरुओं का शुक्राना करें । यह परम्परा हिन्दुस्तान में बहुत पुरानी है । रक्षा बन्धन का त्यौहार है । भाई अपनी बहनों की रक्षा का प्रण करते हैं। ये सभी त्यौहार, विशेषकर Mothers’ Day, Fathers’ Day, Masters’ Day इसीलिए मनाये जाते हैं, ताकि हम अपनी संभाल करनेवालों को याद करें।

गुरु अर्जनदेवजी महाराज की जिंदगी बहुत कष्टों में गुज़री । इन मुश्किलों के बावजूद कितने ही जीवों को उन्होंने प्रभु से जोड़ दिया । जितने भी महापुरुष दुनिया में आते हैं, उनका यही मिशन होता है कि ज़्यादा से ज़्यादा लोग प्रभु से जुड़ सकें, आत्मायें अपने निजधाम पहुँच जायें । यही इस शताब्दी में हुजूर बाबा सावनसिंह जी महाराज, परम संत कृपालसिंहजी महाराज और दयाल पुरुष संत दर्शनसिंहजी महाराज करते रहे हर महापुरुष की वाणी हमें एक ही दिशा देती है। महापुरुष एक ही रास्ते पर चलने के लिए कहते हैं, जो हमारी आत्मा का मिलाप परमात्मा से करा देता है । महापुरुष किसी एक धर्म, किसी एक ख़ास सोसाइटी के लिए नहीं आते, किसी शताब्दी के लिए नहीं आते । वे सारी सृष्टि के लिए आते हैं । वे खुद प्रभु से एकमेक होते हैं जैसा कि संत दर्शनसिंहजी महाराज ने फ़रमाया है :

नाम है आदमी तो क्या, अस्ल में रूहे इश्क हूँ।

सारी ज़मीं है मेरा घर, सारा जहॉं मेरा वतन ॥

बाहरी रूप में वे हमारी तरह इंसान हैं, लेकिन असल में वे प्रभु रूप होते हैं । वे हर देश को, धर्म को अपना समझते हैं क्योंकि सब प्रभु के हैं । हर महापुरुष की वाणी में खुलापन होती है, वे दीवारें खड़ी नहीं करते बल्कि दीवारों को गिराते है । मेरी यही इच्छा है कि जिस रास्ते पर ये महापुरुष हमें चला गए हैं, उस रास्ते पर हम तेजी से आगे बढ़ें, ताकि इसी ज़िंदगी में हम अपने असली घर पहुँच सकें, प्रभु से एकमेक हो सकें ।

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