सच्चा सुख (शिक्षाप्रद आध्यात्मिक कथाएँ) – प्रभु-मिलन

गुरु साहब हमें समझा रहे हैं कि ’नाम’ से हम दूर हैं, नाम की कमाई हमने नहीं की, दुनिया की कमाई में ही लगे रहे । आगे फ़रमा रहे हैं कि जो यौवन का समय था, वह हमने गँवा दिया । यौवन के समय की बसंत ऋतु के साथ तुलना की जाती है । जब बसंत ऋतु आती है तो फूल, पत्तियॉं खिलनी शुरू हो जाती हैं । चारों ओर हरियाली छा जाती है । इसी प्रकार जब इंसान यौवन में पहुँचता है, तो उसमें ज़्यादा उमंग, ताकत, खूबसूरती होती है, इसी अहंकार में हम इस सुनहरे समय को गँवा देते हैं ।

गुरु अर्जनदेव जी हमें समझा रहे हैं : यह जो हमें मानव चोला मिला है, यह आत्मा जो 84 लाख जियाजून में भटक रही है उसका यह यौवन का समय है, बसंत ऋतु का समय है । इस समय का हमें पूरा-पूरा फायदा उठाना चाहिए । जब परम संत कृपालसिंह जी महाराज ने मैट्रिक पास की, तो उसके बाद उन्होंने 7 दिन यही सोच विचार किया कि मुझे आगे जिंदगी में क्या करना है ?

इस सोच-विचार के बाद वे इस नतीजे पर पहुँचे कि ‘God First and World Next,’ प्रभु पहले और दुनिया उसके बाद। गुरु अर्जनदेव जी भी हमें समझा रहे हैं कि इस यौवन को हमें गँवाना नहीं चाहिए । अगर इस समय हमारा ध्यान प्रभु की ओर हो गया, तो इसी जिंदगी में हम प्रभु से एकमेक हो सकेंगे । अगर यह समय व्यर्थ हो गया, तो फिर पता नहीं कब यह मौका मिले । जब यौवन का समय होता है, तो जोश होता है । जोश और मस्ती में हर चीज खूबसूरत लगती है । इस जोश से हम पूरा लाभ उठायें, वे हमें यही बता रहे हैं । जैसे कि एक कवि ने कहा है :

जो जोश ही न हो, तो किस काम की जवानी ।

किस काम की नदी वह, जिसमें न हो पानी ॥

अगर इंसान में जोश न हो, तो कोई कार्य नहीं कर सकता । इतिहास पर गौर करने से मालूम होता है कि बडे-बडे काम जवानी के जोश के बल पर ही हुए हैं ।

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