सच्चा सुख (शिक्षाप्रद आध्यात्मिक कथाएँ) – प्रभु-मिलन

अगर कुएं में भॉंग मिला दी जाए, तो जो भी उसका पानी पीयेगा, वह मस्ती में झूमने लगेगा । हमारी हालत भी कुछ ऐसी ही है । हम इस धरती पर आये हैं । यह धरती जो illusionary world है, जो माया की दुनिया है, हम इस माया की मस्ती में मस्त हो गए हैं ।

हम सोचते हैं कि हम बहुत खुश हैं, बड़े मस्त हैं, लेकिन यह मस्ती भांग की मस्ती है, माया की मस्ती है, यह मस्ती कुछ क्षणों के लिए है । कोई घर गृहस्थी में लगा है, कोई व्यापार बढ़ा रहा है, कोई सैर-सपाटा कर रहा है । हर एक इंसान इस दुनिया के कार्यों में लगा हुआ है । गुरु अर्जनदेव जी महाराज यही समझा रहे हैं कि हम अपनी असली अवस्था को भूल गए हैं क्योंकि हम प्रभु से दूर हैं, अपने असली घर से दूर हैं। आगे वे फरमा रहे हैं :

नाहिन दबु न जोबन माती

मोहि अनाथ की करहु समाई ॥

गुरु अर्जनदेव जी हमें समझा रहे हैं कि न तो हमारे पास धन है : हमारे पास दुनिया का धन तो बहुत है, लेकिन गुरु अर्जनदेव जी नाम की कमाई की बात कर रहे हैं । जब तक नाम का धन हमारे पास नहीं होगा, तब तक हम गरीब ही रहेंगे । बाहर की जितनी भी दौलत हम जमा कर लें, किसी काम की नहीं ।

जब तक रूहानियत के ख़ज़ाने, जो किसी महापुरुष की दया-मेहर से ही मिलते हैं, हम जमा न कर लें, हमारा जीवन बेकार है । जब परमात्मा की नज़रे-करम हम पर हो, वे दयालु हों, कृपालु हों, तभी हमें नाम का धन मिलता है और हम अपने आपको सही रूप में देखते हैं, प्रभु की ओर कदम उठाते हैं । गुरु अर्जनदेव जी महाराज बता रहे हैं कि हमने कोई धन कमाया ही नहीं । कबीर साहिब ने भी यही फरमाया है :

कबीर सब जग निरधना बनवंता नहिं कोय ।

धनवंता सोई जानिए नाम रतन धन होय ॥

धनवान वही है, जिसे नाम की देन मिल गई हो । आप सब जिन्हें हुजूर बाबा सावनसिंहजी महाराज या परम संत कृपालसिंहजी महाराज और दयाल पुरुष संत दर्शनसिंहजी महाराज की दया-मेहर से नाम की देन मिली है, बहुत खुशकिस्मत हैं क्योंकि इस दुनिया में सबसे अनमोल दौलत ‘नाम’ की है।

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