सच्चा सुख (शिक्षाप्रद आध्यात्मिक कथाएँ) – प्रभु-मिलन

हमने एक नया रूप अख्तियार कर लिया है, जो हमारे असली रूप से कहीं अलग है। गुरु साहब यही फ़रमा रहे हैं कि हमारी बुद्धि भी भ्रष्ट हो गई है । हममें सही-ग़लत में फ़र्क करने की अक्ल नहीं रही कि सत्य क्या है, असत्य क्या है ? जो परा-विद्या का ज्ञान हमें होना चाहिए, वह हमारे पास नहीं है और हम अपरा-विद्या के ज्ञान के अहंकार में ही मस्त हैं। उससे क्या हुआ है ? हमारी आत्मिक बुद्धि का नाश हो गया है ।

हमने आत्मिक ज्ञान को पाना था, लेकिन हम बाहरी ज्ञान में ही अटके रह गए । हमारा ध्यान शरीर तक ही सीमित है । हमारी बुद्धि बेकार है । हममें आत्मिक बल था । यहॉं वे शारीरिक बल की बात नहीं कर रहे हैं । वे उस नूर की बात कर रहे हैं, जो हम सबमें है; वह नूर जिससे सारी सृष्टि रची गई, वह शब्द जिसके आधार पर सृष्टि चलती है, जो हमारी रग-रग में समाया हुआ है; वह रोशनी जो अंतर के मंडलों में हमें रास्ता दिखाती है ।

हमारी आत्मा प्रभु की अंश है, चेतन है, प्रभु के प्यार से भरपूर है, प्रभु के नूर से भरपूर है, और उसी नूर से उसे बल मिलता है, जिसे संत दर्शनसिंह जी महाराज ने ‘Soulergy’ के नाम से पुकारा है । जैसे इस सूर्य की ऊर्जा होती है, वैसे ही आत्मा की भी उर्जा है, जो सूर्य की उर्जा से कई गुणा ज्यादा प्रकाशमान है । इसी आत्मिक उर्जा को हम खो बैठे हैं क्योंकि उसके अस्तित्व के बारे में हमें मालूम नहीं है और उसे प्राप्त करने के लिए हम प्रयास भी नहीं करते ।

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