सच्चा सुख (शिक्षाप्रद आध्यात्मिक कथाएँ) – खोज

वे वापिस प्रभु में जा मिलें, उससे एकमेक हों। इस मानव चोले को नरनारायणी देह कहा जाता है। नर का मतलब मनुष्य, जो यह हमारा शरीर है और नारायण का मतलब वह परमात्मा वह प्रभ जो सृष्टि की शुरूआत से पहले था, जो bsolute Form में था। सभी धर्मग्रंथों में आया है कि प्रभु शुरू में अकेला था, उसने संकल्प किया कि वह एक से अनेक हो जाए और उसने दो रूप धारण किए- एक प्रभु की ज्योति का और दूसरा प्रभु के शब्द का।

शरीर को नर-नारायणी देह इसीलिए कहा जाता है क्योंकि इस शरीर में प्रभु बस रहा है। इसे हरि-मन्दिर भी कहा गया है। इस मन्दिर में ही हमें प्रभु की पूजा करनी है। यदि हमें सही मानो में पूजा करनी है, तो हमें इस शरीर के अन्दर जाना होगा। अगर हम इस शरीर के बाहर रहे तो हम प्रभु की सही मानो में पूजा नहीं कर सकते। इसलिए इस शरीर को हरि-मन्दिर कहा गया है। बहुत से धर्मग्रंथों में इसे ‘Roof and Crown of all Creation’ भी कहा गया है।

84 लाख जियाजून में, जिसमें हमारी आत्मा चक्कर लगाती रहती है, उसमें मानव चोला सबसे ऊँचा है, उत्तम है। संत कृपालसिंहजी महाराज फ़रमाया करते थे कि इसमें आकाश तत्त्व प्रबल है, इसमें Ether प्रबल है, उससे हम विवेक पाते हैं। हम यह समझ सकते हैं कि क्या चीज़ ठीक है। जब हमारी समझ ठीक होगी, तो हमारे विचार ठीक होंगे। जब हमारे विचार ठीक होंगे, तो हमारे बोल ठीक होंगे। जब हमारे बोल ठीक होंगे, तो हमारे कार्य ठीक होंगे। इस शरीर के बारे में राजा पीपा जी हमें यही समझा रहे हैं :

कायउ देवा काइअउ देवल काइअउ जंगम जाती ।

यह शरीर प्रभु का घर है, उसी के रूप में बना हुआ है और यहॉं पर ही हम प्रभु को पा सकते हैं। उपनिषदों में भी आया है कि यह शरीर छः चक्रों वाली अयोध्यापुरी है। अयोध्या में श्री राम जी बसते थे और यही कहा जाता है कि राम जी कण-कण में बसते थे, समाये हुए थे और आज भी वही सत्य है। पॉंच चक्र ऐसे हैं, जहॉं से शरीर उत्पन्न होता है, शरीर चलता है और ख़त्म हो जाता है। सबसे पहले गुदा चक्र है, फिर इन्द्री चक्र है, फिर नाभि चक्र है, फिर ह्वदय चक्र है और फिर कंठ चक्र है।

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