सच्चा सुख (शिक्षाप्रद आध्यात्मिक कथाएँ) – खोज

हमारी जिंदगी एक लगातार चलने वाला स्वप्न है और जब तक हम जीते हैं, यह स्वप्न चलता रहता है और जब हम स्वप्न में होते हैं तो ऐसा लगता है कि यही सच है। संत दर्शनसिंहजी महाराज परमात्मा से, सत्गुरु से, प्रभु से यही प्रार्थना कर रहे हैं कि इसकी असलियत क्या है, आप मुझे समझा दीजिए और उसी असलियत की बात यहॉं राजा पीपाजी कर रहे हैं। वे फरमा रहे हैं :

कायउ देवा काइअउ देवल काइअउ जंगम जाती ॥

यह जो काया है, जो मानव चोला है, यह क्या है ? यह देव के समान है, इसमें देवता बैठा हुआ है, देव का यह घर है। देव यहॉं bsolute God, परमात्मा को कहा गया है। इसीलिए इस शरीर को हरि-मंदिर कहा जाता है, इसी को दसवां द्वार भी कहा जाता है, इस शरीर रूपी अयोध्या में जो राम है, जो परमात्मा है, वह कण-कण में बसा हुआ है, इसी बात को राजा पीपा जी हमें समझा रहे हैं :

कायउ देवा काइअउ देवल देवल का मतलब मन्दिर है।

यह शरीर एक मन्दिर है और इस शरीर में प्रभु बस रहा है। आगे वे फरमा रहे हैं :

काइअउ जंगम जाती ॥

यह शरीर और क्या है ? यह एक चलता- फिरता तीर्थ-स्थान है। इंसान एक तीर्थ यात्रा पर है, किस तीर्थ यात्रा पर जाना चाहिए? जो अन्दर धर्मस्थान है। अन्दर में कौन सा धर्मस्थान है ? यहॉं वे अन्दर के मंडलों की बात कर रहे हैं। इस शरीर के अन्दर कई मंडल हैं- पिंड, अंड, ब्रह्मंड, पारब्रह्म, सचखंड- ये सब हमारे भीतर हैं और हमारे सही रूप- हमारी आत्मा को उस तीर्थ-यात्रा पर जाना है, वह यात्रा जो हमें इस शरीर से ऊपर अन्दर के मंडलों में ले जाए। यहॉं राजा पीपा हमें समझा रहे हैं कि हमारा इस शरीर से क्या संबंध है और हमारे इस जीवन का क्या लक्ष्य है।

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