सच्चा सुख (शिक्षाप्रद आध्यात्मिक कथाएँ) – शरण

यहॉं गुरु अर्जनदेवजी महाराज हमें यही समझा रहे हैं कि परमात्मा के बिना और कोई नहीं है। उसे हम हज़ारों नामों से पुकार सकते हैं, क्योंकि हमारी भाषाएं अलग-अलग हैं। लेकिन हकीकत में तो वह एक है, वह प्रभु, वह परमात्मा जिसने यह सारी सृष्टि रची है, उस परमात्मा के ज़रिये ही सब कुछ चल रहा है। आगे गुरु अर्जनदेवजी महाराज फरमा रहे –

जो जनु सेवे तिसु पूरन काज ।

दास अपुने की राखहु लाज ॥

जो इंसान, जो मानव आपका सेवक बन गया, सेवक बनने से मतलब है कि जो सही तरीके से जीने लगा, जब वह आपके बताए हुए तरीके के मुताबिक़ जीयेगा, तो वह पूर्ण हो जाएगा, perfect हो जाएगा। वह उस स्थिति मे पहुँच जाएगा जिसमें वह आपसे मिल सकेगा। जब वह पूर्ण हो जाएगा, तब ऐसे दास की लाज आपको रखनी ही पड़ेगी। यहॉं पर लाज रखने का मतलब बहुत गहरा है। इंसान की लाज परमात्मा कैसे रखता है, इसके बहुत से उदाहरण आपने इतिहास में देखे होंगे।

भक्त प्रल्हाद का उदाहरण ले लें। उसके पिता ने उसे मारने की बहुत कोशिश की, आग में जलाने की कोशिश की, पहाड़ से गिराने की कोशिश की, लेकिन प्रभु ने ऐसा नहीं होने दिया। यहॉं पर बाहरी लाज की बात नहीं हो रही है, वह अलग किस्म की लाज है, लेकिन असली लाज यह है कि परमात्मा ने हमें दुनिया में भेजा है और इस ध्येय से भेजा है कि हम अपने आप को जान लें और प्रभु में लीन हो जाएं। जब वह लक्ष्य पूरा हो जाएगा, तो हमारी लाज रख ली जाएगी।

यहॉं पर गुरु अर्जनदेवजी महाराज फरमा रहे हैं कि जिस इंसानने सेवा भाव से अपनी जिंदगी जी, भक्ति भाव से जिंदगी जी, ऐसी जिंदगी व्यतीत की, जो सच्चाई की जिंदगी थी, एक ऐसी जिंदगी जी, जो निष्काम सेवा से भरपूर थी, ऐसी जिंदगी व्यतीत की, जो अहिंसा से भरी हुई थी, पवित्रता से भरी हुई थी और नम्रता से भरी हुई थी; तो ऐसे इंसान की परमात्मा लाज रखता है; उसे वह अपने आप से जोड़ लेता है। आगे गुरु अर्जनदेवजी महाराज फ़रमा रहे हैं :

तेरी सरणि पूरन दइआला ।

तुझ बिनु कवनु करे प्रतिपाला ॥

हे प्रभु! आप तो पूर्ण रूप से दयालु हैं, कृपालु हैं, सब पर दया-मेहर करते हैं, करुणा के महासागर हैं, हम सब की मदद करते हैं। आप के बिना हम सब की सँभाल कौन करेगा? जब हम बच्चे होते हैं, तो हमारे मॉं-बाप हमारा पूरी तरह से ख्याल करते हैं। हमारे मां-बाप की यही कोशिश होती है कि हम तन्दुरुस्त रहें, पढ़-लिख कर अच्छे इंसान बनें और कोई भी तकलीफ हमारी जिंदगी में नहीं आए। मॉं- बाप बच्चों को बहुत ज़्यादा प्यार करते हैं, लेकिन यह कहा गया है कि परमात्मा माता-पिता की अपेक्षा हमसे हज़ारों गुणा ज़्यादा प्यार करता है। यहॉं पर उसी भाव को पेश किया गया है कि हे प्रभु!

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