सच्चा सुख (शिक्षाप्रद आध्यात्मिक कथाएँ) – शरण

समय किसी का इंतज़ार नहीं करता, चाहे कोई राजा-महाराजा हो, अमीर हो, किसी देश का राष्ट्रपति हो। समय किसी के लिए नहीं रुकता। जो क्षण हमें मिले हैं इस शरीर में, आहिस्ता-आहिस्ता बीत रहे हैं। इन क्षणों का हमें पूरा फायदा उठाना है। इन कीमती क्षणों का पूरा फायदा तभी हो सकता है, जब हमारा ध्यान प्रभु की ओर हो। ध्यान उसी में होता है, जिसे हम पसंद करें। महापुरुष हमें यही समझाते हैं कि हमारी आत्मा परमात्मा से प्रेम करे। प्रभु इस हरि-मन्दिर में है, इस शरीर में है, कण-कण में बसा हुआ है और हमारी आत्मा परमात्मा की अंश है, इस शरीर को जान दे रही है, वह भी शरीर में बस रही है, दोनों का मिलाप होना है। यही जिंदगी का ध्येय है।

परम संत कृपालसिंहजी महाराज फ़रमाया करते थे कि हमारी हालत ऐसी है, जैसे कि एक ही घर में पति-पत्नी रहते हैं, लेकिन आपस में बात नहीं करते। आत्मा और परमात्मा इस शरीर में रहते हुए भी अलग हैं। प्रभु हमसे मिलने के लिए बेताब है, लेकिन हमारा ध्यान दूसरी ओर है, हम माया के जाल में फंसे हुए हैं। गुरु अर्जनदेवजी महाराज हमें समझा रहे हैं कि परमात्मा हमारी आत्मा के अंग-संग है। हमारी आत्मा का रिश्ता परमात्मा से ऐसा है, जैसे मछली और पानी का। मछली जल में रहती है, जल ही उसका जीवन आधार है। जल के बिना मछली जीवित नहीं रह सकती। परमात्मा हमारी रग-रग में समाया हुआ है। आत्मा परमात्मा की अंश है और इस शरीर को शक्ति दे रही है। जब आत्मा शरीर छोड़ देती है, तो शरीर बेजान हो जाता है।

अगर हमारी जिंदगी शरीर को साफ़ रखने में ही गुज़र गई, तन्दुरुस्त रखने में ही चली गई, तो जिंदगी जीने का कोई फायदा नहीं है। शरीर में आने का मक्सद यही है कि हम आत्मिक तरक्की करें। आत्मिक तरक्की क्या है? हमारी आत्मा, हमारी रूह, जिसे परमात्मा से बिछुड़े लाखों-करोड़ों साल हो गए हैं, फिर से प्रभु से एकमेक हो सके। प्रभु से हम कैसे मिल सकते हैं ? प्रभु में क्या-क्या गुण हैं ? जब हमें उन गुणों के बारे में मालूम होगा, तो हम भी उन गुणों को अपने जीवन में ढालने की कोशिश करेंगे, ताकि प्रभु प्रसन्न हों।

आगे गुरु अर्जनदेवजी महाराज फरमा रहे हैं कि हे प्रभु! आपके समान दूसरा और कोई नहीं है। आप ही सब कार्यों को सँभाल रहे हैं। आप ही ने सब रचना रची है, आप से ही सृष्टि चल रही है। जब हम धर्मग्रंथों को पढ़ते हैं, तो हमें मालूम होता है कि शुरू में परमात्मा अकेले थे। उन्होंने एक से अनेक होने का संकल्प किया। उस संकल्प से एक हिलोर उत्पन्न हुई और प्रभु ने दो रूप धारण किए : एक ज्योति का और दूसरा श्रुति का और इसी धारा के ज़रिये कई मंडल बने, वे मंडल जो बहुत सूक्ष्म हैं, चेतनता से भरपूर हैं। पहला मंडल सचखंड का है, जो चेतनता से भरपूर है और उससे नीचे परब्रह्म, ब्रह्म और अंड, पिंड के मंडल बने । जैसेजैसे यह धारा नीचे उतरती चली गई, इसमें माया की मिलावट होती गई ।

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