सच्चा सुख (शिक्षाप्रद आध्यात्मिक कथाएँ) – तारणहार

जब तक हम इसे अपना घर समझते रहेंगे, हम इसी दुनिया में लगे रहेंगे। लेकिन जब हम यह अच्छी तरह समझ लें कि यह हमारा घर नहीं है, तो हमारी मुक्ति होनी निश्चित है। हमारा घर कौन सा है ? दयाल का घर है :

दयाल घर आई जनम सुधार।

यह मानव जन्म हमें इसलिए मिला है ताकि हम अपने असली घर, दयाल के घर पहुँच सकें। अंड, पिंड, ब्रह्मंड को पार करके हमने पारब्रह्म में पहुँचना है, जो काल के दायरे से बाहर है, फिर हमें सचखंड पहुँचना है। स्वामीजी महाराज हमें समझा रहे हैं कि यह जो हमें देह मिली है, जो हमारा शारीरिक जन्म हुआ है, इसका कोई मकसद है।

इस शरीर में वे सब पदार्थ हैं, जो हमें चाहियें, अपने आपको जानने के लिए और परमात्मा को पाने के लिए। इस जीवन को हम गँवायें नहीं। यह जीवन हमें अपना सुधार करने के लिए मिला है, अपनी आत्मा का सुधार करने के लिए मिला है। आत्मा का सुधार कैसे होगा? जब वह 84 लाख जियाजून के बंधन से मुक्त हो जाएगी और प्रभु में लीन हो जाएगी, दयाल के घर पहुँच जाएगी। किसी गुरु की शरण में पहुँच कर, नाम से जुड़कर ही हम दयाल के घर पहुँच सकते हैं। आगे स्वामीजी महाराज फ़रमा दे है –

संत गति पाई गुरु की लार ।

शब्द संग मिली मिला पद चार ॥

जब हम गुरु की संगत में पहुँचते हैं, जब हम में receptivity पात्रता आती है, सेवा भावना आती है तब हम शब्द में लीन हो जाते हैं, शब्द की कमाई करनी शुरू कर देते हैं और हम चौथे पद में पहुँच जाते हैं। हमारे मन की अलग-अलग अवस्थाएँ हैं। सबसे पहली अवस्था है subconscious mind जहॉं मन अचेतन है, चेतनता का ज़रा भी अंश नहीं है। दसरी स्वप्न की अवस्था है. जिसमें हम semi-conscious state में पहूँच जाते हैं।

तीसरी conscious mind की अवस्था है, जिसे जागृति की अवस्था कहा जाता है। इनके पार जो चौथी अवस्था है, जिसे तुरिया की अवस्था कहा जाता है, उसी की स्वामी जी महाराज बात कर रहे हैं कि जब हम गुरु की संगत में पहुँचते हैं, तो वे हमें शब्द के साथ जोड़ देते हैं और हम purely conscious state में, जो तुरिया की अवस्था है, जिसे जुनूं कहा गया है, शुद्ध चेतन अवस्था कहा गया है, पहुँच जाते हैं।

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