सच्चा सुख (शिक्षाप्रद आध्यात्मिक कथाएँ) – काली कोयल

वह अवस्था भी बहुत ज़रूरी है, उस अवस्था में हम अपने आपको तब पाते हैं, जब हम अपने प्रीतम से परे हों। महापुरुष हमें समझाने की कोशिश करते हैं और समझाते चले आये हैं कि हम अपने आप को सही रूप में जानें और वह रूप क्या है कि हम प्रभु के अंश हैं और किसी कारण हम उससे बिछुड़ चुके हैं।

हमें परमात्मा से एकमेक होना है, उससे मिलना है और हम प्रभु से तभी मिल सकेंगे, जब हममें एक restlessness होगी, एक passion होगा प्रभु को जानने का, प्रभु को पाने का। जब तक वह विरह नहीं होगी, वियोग नहीं होगा, तब तक हम प्रभु को पा नहीं सकते। जिस चीज़ को पाने की हमें बहुत ज़्यादा इच्छा न हो, तब तक उसे हम पाते नहीं हैं और इसके बारे में बहुत से महापुरुषों ने अलग-अलग तरीके से लिखा है। संत दर्शनसिंहजी महाराजने जो वियोग की अवस्था है, उसके बारे में फ़रमाया है :

मुहब्बत नाम है बेताबी-ए-दिल के तसल्सुल का

मुहब्बत की मैं ’दर्शन’ ये निशानी लेके आया हूँ

– मताओ नूर, ग़ज़ल-9

वे आम मुहब्बत की बातचीत नहीं कर रहे, वे प्रभु से प्रेम की बातचीत कर रहे हैं। जो दिल में हर समय बेचैनी रहती है, वही असल किस्म की मुहब्बत है और संत दर्शनसिंहजी महाराज फ़रमा रहे हैं कि यह जो लगातार की बेचैनी है, इसीको लेकर मैं इस दुनिया में आया हूँ। वे हमें समझा रहे हैं कि वह बेचैनी हममें होनी चाहिए। अगर वह बेचैनी नहीं है, तो हम प्रभु को पा नहीं सकते। इसी बेचैनी की बात यहॉं बाबा फ़रीद जी कह रहे हैं कि प्रभु से अलग होकर, अपने प्रीतम से अलग होकर कोयल जल रही है, बेताबी में है और इसीलिए उस पर कालापन आ गया है। आगे बाबा फ़रीद जी फरमा रहे हैं :

तपि तपि लुहि लुहि हाथ मरोरउ ॥

बावलि होई सो सहु लोरउ ॥

जल-जल कर और तड़प-तड़प कर मैं अपने हाथों को मरोड़ रही हूँ। इसका मतलब है कि मैं पछता रही हूँ। क्यों पछता रही हूँ ? जो मेरे पति परमेश्वर हैं, जो मेरे प्रीतम हैं, उनसे मैं अलग हो गई हूँ और उनको ढूँढने के लिए मैं पागल हो गई हूँ। पागल होना यहॉं पर बाहर की दुनिया के पागलपन का ज़िक्र नहीं है। वह बता रही है कि इतनी कशिश मुझमें पैदा हो रही है, प्रभु से मिलने की कि मैं हर कष्ट उठाने के लिए तैयार हूँ।

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