सच्चा सुख (शिक्षाप्रद आध्यात्मिक कथाएँ) – काली कोयल

इस प्रतीक के ज़रिये बाबा फ़रीद हमें समझा रहे हैं कि हमारी जिंदगी एक कौए के माफिक है। इसलिए कौए ज़्यादा दिखाई देते हैं, मगर कोयल बहुत कम। हम लोग इस दुनिया की गन्दगी में लगे हुए हैं और इस दुनिया की गन्दगी का कालापन हम पर चढ़ा जा रहा है। कोयल को वे एक महापुरुष के रूप में हमें दर्शा रहे हैं; एक ऐसा महापुरुष जो प्रभु की याद में हर समय रहता है। उसके द्वारा वे हमें समझा रहे हैं कि हमें भी एक कोयल के माफ़िक बनना है। यह सारा शब्द हमें बार-बार यही समझाता है कि हम एक ऐसे इंसान बनें, जो प्यार से भरपूर हो, प्रभु के प्यार से भरपूर हो।

जब इंसान प्रभु के प्यार से भरपूर होगा, तभी उसमें भक्ति का भाव होगा। जब कोयल को हम देखते हैं, तो कोयल क्या करती है ? वह अपने अंडे, जहॉं कौए के अंडे होते हैं, उन्हीं में जाकर मिला देती है क्योंकि उसको यकीन है कि वहॉं बच्चे ठीक-ठाक रहेंगे। ऐसा यक़ीन हमें तभी आता है जब कि हमारी लगन प्रभु की ओर हो। जितने भी महापुरुष आये हैं, उन सबने अपने शब्दों में हमें यही समझाया है कि हमारा असली रूप हमारी रूह है, हमारी आत्मा है, उसे परमात्मा से मिलना है। किस तरीके से मिलना है, वे तरीके महापुरुष हमें बताते चले आये हैं। जब हम प्रभु से मिलने की बात करते हैं, तो प्रभु से प्रेम के दो पहलू बताए जाते हैं।

एक पहलू है, मिलन का और दूसरा पहलू है, विरह का। जब हम अपने प्रीतम से मिलते हैं, तो हम आनन्द की अवस्था में चले जाते हैं। इसी अवस्था का वर्णन महापुरुषों ने धर्मशास्त्रों में किया है। जब हम ध्यान टिकाते हैं, अंतर्मुख होते हैं, यहॉं शिव-नेत्र पर एकाग्र होते हैं, तो प्रभु का जो शब्द है, प्रभु का जो नूर है, जो हम सब के अन्दर है, उसके साथ हम जुड़ जाते हैं, तो वह एक blissful state (परमानंद की अवस्था) होती है।

जो हमारा निजी रूप है, उसे सत्-चित्-आनन्दमय कहा गया है क्योंकि वह परमात्मा का अंश है। जो आनन्द की अवस्था है, उसमें हम तभी पहुँचते हैं, जब हमारा मिलाप परमात्मा से होता है, उसके शब्द से होता है क्योंकि प्रभु और शब्द एक ही हैं, उनमें कोई फर्क नहीं है। वह अवस्था ऐसी है, जो सदा-सदा के लिए रहती है। लेकिन एक दूसरी भी अवस्था है जो वियोग की अवस्था है, विरह की अवस्था है, restlessness (बेचैनी) की अवस्था है।

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