सच्चा सुख (शिक्षाप्रद आध्यात्मिक कथाएँ) – प्रभु-रक्षा

यह perfection की state (पूर्णता की अवस्था) है। बाकी सभी states imperfect (अपूर्ण अवस्थाएँ हैं। जब तक हम प्रभु से एकमेक नहीं होंगे, उस महासागर में मिलेंगे नहीं, तब तक जिस अवस्था में हमें होना चाहिए, वह अवस्था जो दुःख-दर्दो से पार है, वह अवस्था जो सुख से भरी है, जो आनन्द से भरी है, उस अवस्था में हम नहीं पहुँच सकते। आख़िर में गुरु अर्जनदेवजी महाराज फरमा रहे हैं :

कहु नानक किरपा भई प्रभ भए सहाई ॥

यहॉं पर वे शुक्राना कर रहे हैं कि हे नानक! प्रभु की मुझ पर इतनी कृपा हुई है कि उसने मुझे अपना सहाई (बंदा, सेवक) बना लिया है, अपना बना लिया, मैं प्रभु के साथ हो गया। प्रभु के साथ होने का मतलब है कि हम इस शरीर से ऊपर उठ सकें, प्रभु की ज्योति के साथ जुड़ सकें और परमात्मा से एकमेक हो सकें। जब हम प्रभु से एकमेक होते हैं, तो हमारे दुःख-दर्द हट जाते हैं। गर्मी के मौसम में जो गर्म हवा है, उसमें एक वातानुकूलित वातावरण हो जाता है।

जब आप वातानुकूलित कमरे में हों, तो बाहर चाहे तापमान 46O हो या 50O हो, अन्दर 25O ही रहता है, ताकि शरीर को गर्मी न लगे। इसीप्रकार गुरु अर्जनदेवजी महाराज हमें समझा रहे हैं कि प्रभु की बहुत बड़ी कृपा हम पर होती है जब हम किसी महापुरुष की शरण में आते हैं। हम एक वातानुकूलित अवस्था में पहुँच जाते हैं और जब हम उस अवस्था में पहुँचते हैं, तो बाहर की दुनिया का हम पर कोई असर नहीं होता। हमारे आस-पास लक्ष्मण रेखा होती है, हमारे आस-पास दया-कृपा का दायरा होता है।

इस दुनिया में जीते-जी जो दुःख-दर्द हैं, जो कैंसर के माफ़िक हमें खा रहे हैं, उनसे हम बच जाते हैं। काल ने क्या किया है कि जैसे कैंसर शरीर को खा लेता है, ऐसे ही काल आत्माओं को खा लेता है, उसे एक चीज़ में लगाकर, दूसरी चीज़ में लगाकर, तीसरी चीज़ में लगाकर। जब से हम दुनिया में आते हैं, काल के दायरे में ही लगे रहते हैं और प्रभु को जाने बगैर ही हम इस दुनिया से चले जाते हैं। तो जिसप्रकार कैंसर इंसान को खाता है और शरीर ख़त्म हो जाता है, ऐसे ही हमारी आत्मा को जो यह सुनहरा मौका मिला है, अपने आपको जानने का और परमात्मा को पाने का, वह ख़त्म हो जाता है और जीवन व्यर्थ चला जाता है।

जैसे कैंसर के महारोग से यह जिंदगी तबाह हो जाती है, वैसे ही यह मौका प्रभु से मिलने का, यह मौक़ा अपने आप को जानने का, प्रभु को पहचानने का, हमारे हाथ से निकल जाता है। जो जिंदगी हमें मिली है, यह जो नर नरायणी देह मिली है, यह देह जिसे  ‘Roof and Crown of all Creation’ ’ कहा जाता है, यह सुनहरा मौका फिर नहीं मिलता। इस शब्द में गुरु अर्जनदेवजी महाराज हमें यही समझा रहे हैं कि हम प्रभु की शरण में पहुँचें, किसी महापुरुष की शरण में पहुँचें, ताकि कर्मों के चक्कर से हम निकल सकें, उसके शब्द के साथ जुड़ सकें और इस ज़िंदगी में आने का जो मक़सद है, अपने आपको जानना और परमात्मा को पाना, उसको हम पूरा कर सकें।

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