सच्चा सुख (शिक्षाप्रद आध्यात्मिक कथाएँ) – प्रभु-रक्षा

हम अपने अंतर में झॉंके, हम अंतर्मुख हों, ताकि उस नूर को देख सकें, उसे पहचान सकें, उसका अनुभव कर सकें; और वह तब होता है जब कोई महापुरुष हमें अंतर्मुख होने का तरीका बता देता है। आगे गुरु अर्जनदेवजी महाराज फ़रमा रहे हैं:

राम नामु अउवधु दीआ एका लिव लाई ॥

यहॉं राम का मतलब है वह महापुरुष जो प्रभु से एकमेक है, जिसे परमात्मा ने खुद इस दुनिया में भेजा है। जो रमा हुआ नाम है, वह शब्द है, वह शब्द जो प्रभु से उत्पन्न हुआ, वह शब्द जिससे सारी सृष्टि की रचना हुई। जब उस नाम का अमृत हमें मिलता है, तो उससे हमारी attention (तवज्जोह) एक तरफ़ लग जाती है, परमात्मा की ओर लग जाती है।

राम नामु अउवधु दीआ एका लिव लाई ॥

जब हम किसी महापुरुष की शरण में जाते हैं, तो वे क्या करते हैं कि जो हमारा ध्यान सबतरफ जा रहा है : काम में जा रहा है घर की तरफ जा रहा है, पैसा कमाने में जा रहा है, पढ़ने-लिखने में जा रहा है और सैर-सपाटे में जा रहा है, उसको वे इकट्ठा कर देते हैं। कहॉं इकट्ठा कर देते हैं ? दो भ्रू-मध्य, शिव-नेत्र पर, ताकि हम उस शब्द के साथ जुड़ सकें और हमारा सारा ध्यान उस शब्द में हो जाए; वह शब्द, जो परमात्मा के साथ है, वह शब्द, जो खुद परमात्मा है, ताकि हमारा ध्यान प्रभु में ही लीन रहे। इसीलिए बार-बार कहा जाता है कि जाप करो। किसका जाप करो?

प्रभ के नाम का. ताकि हमारा ध्यान प्रभु की ओर हो। और प्रभु क्या है? वह शब्द है, वह नाम है, वह नूर है, जो हमें दो भ्रू-मध्य एकाग्र होकर, शिव-नेत्र पर एकाग्र होकर मिलता है। गुरु अर्जनदेवजी महाराज हमें यही समझा रहे हैं कि जब हम एक पूर्ण सत्गुरु की शरण में आते हैं, तो वे हमें नाम के साथ जोड़ देते हैं, ताकि जो हमारी जिंदगी का मकसद है, उसको हम पूरा कर सकें। नहीं तो यह जिंदगी बेकार हो जाएगी और फिर से हम 84 लाख जियाजून के चक्कर में पड़ जायेंगे।

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