प्रेरक वचन दादी जानकी के-  आत्म-सम्मान की शक्ति

स्वयं से कहें, मैं आत्मा हूँ, परमात्मा की संतान। ईश्वर मुझे स्वीकार करता है, समझता है और प्यार करता है। मैं एक वीर अभिनेता हूँ। मेरा गिरना और उठना शीत और बसंत ऋतु के समान स्वाभाविक है। यह काया एक परिधान है, अनेक परिधानों में से एक, जिसे धारण कर मैं अपनी भूमिका निभाने में सफल हो सका हूँ। यह मेरी रचना है और यह उन पहलुओं को प्रतिबिंबित करती है, जो मैं हूँ, लेकिन यह मैं नहीं हूँ। मैं चिरंतन आत्मा हूँ। मेरी मूल प्रकृति प्रेम, शांति और आनंद की है। अस्तित्व के इस शाश्वत नाटक में प्रत्येक का किरदार उसका अपना है। इसमें कहीं भी कुछ नया नहीं है और इसके बारे में कुछ भी चिंता करने योग्य नहीं है। पुनर्जन्म का कार्य पहले ही अनगिनत बार पूरा किया जा चुका है।’’

जब हम इस प्रकार अपने आपसे बात करते हैं, हम ऐसे आत्म-सम्मान से भर जाते हैं कि इस जीवन का स्वरूप बदल देने के साथ-ही-साथ हम उस चेतना के सह-रचयिता बन जाते हैं, जो संसार का कायाकल्प करेगी। बुद्धि एकाग्र एवं प्रभावशाली तथा ईश्वर का ‘स्पर्श’ पाने योग्य हो जाती है, ताकि उसके अनुरूप कार्य कर सके, जिसकी इस संसार में आवश्यकता है।

ईश्‍वरीय कार्य में योगदान करना

जब हम ईश्‍वर द्वारा हमारे ऊपर बरसाए जा रहे प्रेम एवं ज्ञान को समझ लेते हैं और स्वीकार कर लेते हैं, तो हम ईश्‍वरीय गुणों से भर जाते हैं तथा इस योग्य हो जाते हैं कि दूसरों से सदैव प्रेममय व्यवहार कर सकें। हमें ऐसी शक्ती चाहिए कि जब हम दूसरे लोगों की दुर्बलताओं को देखें, तो ऐसा लगे कि हमने उन्हें देखा ही नहीं। प्रतिक्रिया दरशाने की बजाय हम विनम्र और दयावान बने रहें।

         (प्रजापिता ब्रम्हाकुमारी ईश्‍वरीय विश्‍व विद्यालय) (क्रमश:87)

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