प्रेरक वचन दादी जानकी के-शुद्धता की शक्ति

शुद्ध ज्ञान जब मैं परमेश्वर को याद करती हूँ, उस समय ऐसी अनुभूति होती है कि अब तक जो कुछ भी हुआ है, समय की धुंध में विलीन हो जाता है । मुझ पर उसकी कोई पकड़ नहीं है । मैं विद्यमान हूँ और निर्भीक हूँ । यह ऐसी अनुभूति है, मानो मैं ईश्वर की आँखों में बैठी हूँ और संपूर्ण ब्रह्मांड को उस तरह देखती हूँ, जैसे वह देखता है, अनासक्ति और प्रेम के साथ सबकुछ भूत, वर्तमान और भविष्य इस शुद्ध ज्ञान में सम्मिलित है ।

इस अनुभव में खोए हुए, मैं जानती हूँ कि सबकुछ ठीक है । यदि मैं समस्याओं या स्थितियों के प्रति सजग रहती हूँ, तो ईश्वर मुझसे दूर हो जाता है । परम पिता बहुत सच्चा, बहुत मधुर और बहुत प्यारा है । मैं उसकी हैं और उसे अपने साथ रखती हूँ, मुझे इतना आनंद प्राप्त होता है, जितना भौतिक जगत् की कोई भी चीज मुझे नहीं दे सकती । ईश्वर के आध्यात्मिक प्रेम से जो संकल्प और शक्ति प्राप्त होती है, भौतिक प्रेम का स्थान ले लेती है और एक महान विरासत खड़ी कर देती है । यह निर्वाण से कुछ कम नहीं है, अंदर सत्य का पुनर्स्थापन है । परम पिता का प्रेम पाने योग्य बनने के लिए हमें हृदय की गहराई से प्रयत्न करना चाहिए ।

यह प्रयास सत ही नहीं हो सकता। पिता का प्रेम हमसे मन और बुद्धि को पूर्णतया मुक्त रखने की अपेक्षा करता है । हम पुरानी आदतों से चिपके नहीं रह सकते, जैसे कि दूसरे लोगों में स्वयं को भूल जाना या कार्य में व्यस्त हो जाना ।

(प्रजापिता ब्रम्हाकुमारी ईश्‍वरीय विश्‍व विद्यालय)

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