प्रेरक वचन दादी जानकी के-समय को जानना

यह परमात्मा की मुख्य भूमिका है और इतने सारे लोग किसलिए उसे अपने अंतिम रक्षक के रूप में, जाने या अनजाने याद करते हैं । वह न केवल आध्यात्मिक ज्ञान पुन: उत्पन्न करता है, जो हमें अपने घर पहुँचाएगा, अपितु उस चेतना को भी पुन: जाग्रत् करता है, जो धरती पर स्वर्ग की पुनर्स्थापना करती है ।इस समझ की शक्ति एवं खूबसूरती का एक और पहलू है कि यह वर्तमान के लिए गुंजाइश रखते हुए, हमें अमरत्व की भावना का एहसास कराती है ।

बहुत लोग यह अवश्य समझते हैं कि वर्तमान में रहते हुए हम जीवन के प्रवाह के साथ अपने कदम अधिक अच्छी तरह मिला सकते हैं, बजाय इसके कि हम अतीत की घटनाओं या भविष्य की चिंताओं से चिपके रहें । तथापि, यदि आप आज की परिपूर्णता से दूर दुनिया में, जीवन में फँसे रहना चाहते हैं तो निरंतर ’वर्तमान में टिके रहना शायद संभव न हो । कुल मिलाकर समय-चक्र की तुलना में यदि हमें यह ज्ञान हो जाता है कि हमारी स्थिति क्या है तो उससे हमारे लिए न केवल स्वयं को समझना सरल हो जाता है, बल्कि दूसरों को समझाने में भी आसानी होती है । यह ज्ञान हमें अपने आपको अपने दोषों के साथ स्वीकार करने की शक्ति देता है । और हम इस सच्चाई से भी मुँह नहीं फेरते हैं, कि मूलत: हम क्या थे और क्या बनने जा रहे हैं?वाराणसी में दिव्य-दर्शन ।

समय-चक्र का ज्ञान ब्रह्माबाबा को सन् 1930 के दशक के आरंभिक काल में प्राप्त हुआ ।वे भारत के सबसे प्राचीन नगर वाराणसी में एक मित्र के घर में ठहरे हुए थे, जब उन्होंने स्वयं को एक दीवार पर बार-बार गोले बनाते हुए पाया। उसी समय उनके मानसपटल पर जो रेखा चित्र उभरे, उनमें मृत्यु एवं विनाश के रहस्यपूर्ण दृश्य शामिल थे, जिसके बाद उन्होंने तारों को धीरे-धीरे कोमलता से धरती पर उतरते हुए देखा और जहाँ-जहाँ-उतरे वहाँ-वहाँ, सर्वांगीण मानव सरीखे देवी-देवताओं की आकृतियाँ सहसा प्रकट हो गईं।

(प्रजापिता ब्रम्हाकुमारी ईश्‍वरीय विश्‍व विद्यालय)

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