प्रेरक वचन दादी जानकी के-ईश्वर को जानना

यही है ‘तीसरे नेत्र’ का खुलना, अंतरंग पहचान और ज्ञान की दृष्टि, जो हमें ईश्वर से जोड़ती है। जब हमने सदियों से चले आ रहे विचारों को ग्रहण करते हुए, भक्तिपूर्ण ढंग से ईश्वर से सचमुच प्रेम किया, तब वैयक्तिक दृष्टि से अपनीअपनी बात रखने और पक्षपात दरशाने की बहुत गुंजाइश थी। आज विश्व को चेतनता के वैश्विक नवीकरण की आवश्यकता है और उसके लिए हमें इस संबंध में पूर्णतया स्पष्ट होना चाहिए कि हम कौन हैं, ईश्वर कौन है और अब हमारे लिए क्या करना जरूरी है?ईश्वर समान बननायह धारणा सर्व मान्य है कि ईश्वर हर जगह मौजूद है।

इसे भक्तिमय भावनाओं की अभिव्यक्ति के रूप में देखा जा सकता है, लेकिन यह धारणा ईश्वर से शक्ति ग्रहण करने की क्षमता को धुंधला कर देती है। यह सच है कि प्रकृति में ऐसे गुण हैं, जो हमें ईश्वर का स्मरण करा सकते हैं। भौतिक जगत् में भी सूक्ष्म तंत्र काम करते रहते हैं, जो उन रहस्यवादियों तथा दूसरों की याद दिलाते हैं, जो उनकी अधिक गहरी वास्तविकताओं तक पहुँचने की क्षमता रखते थे। आकाश दिव्यऊर्जा से अनुप्राणित है।

यदि ईश्वर सर्वत्र है, तो आप में और मुझ में, सूरज व तारों में, कंकड़ और पत्थरों मे कौन है, जो हमारी सच्चाई हमें वापस दिला सके? ईश्वर को अमूर्त, देहरहित, आकारविहीन मानकर सबसे अच्छी तरह समझा जा सकता है। वह स्थान और समझ के परे रहता है।

(प्रजापिता ब्रम्हाकुमारी ईश्‍वरीय विश्‍व विद्यालय)

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