व्यक्ति एक व्यक्तित्व -अनेक ब्रह्माकुमार भ्राता जगदीश चन्द्र एक जीवन्त जीवन-पथ

हम किसी एक परिवार वालों के घर में ठहरे हुए थे लेकिन अपने खाने-पीने, रहने-करने में पक्के थे। वे मेरे हाथ से बना हुआ ही खाते थे। मुझे खाना बनाना नहीं आता था, फिर भी जो था, जैसा था उसको बहुत प्यार से, रिगार्ड से खाया करते थे और मेरी प्रशंसा कर मेरा उमंग-उत्साह बढ़ाते थे। खाना तो ख़ास नहीं होता था। चावल और दालसब्जी। उन्होंने कहा था कि आप जो भी बनाओगी, जैसा भी बनाओगी, मैं खाऊँगा। मैं समझती थी कि मैं उनके लिए खाना बनाने के योग्य नहीं हैं लेकिन उनकी हिम्मत भरनेवाली बातों से मैंने खाना बनाना सीख लिया कुछ हद तक।

हर स्थान पर मुझे ही पहला अवसर देते थे

वह मेरे लिए पहला मौका था उनके साथ सेवा करने का। विश्वविद्यालय में भाषण उनको ही करना था क्योंकि निमन्त्रण उनको ही था लेकिन भाषण करने से पहले, मुझसे अति नम्रतापूर्वक उन्होंने विनती की कि मेरे से पहले आप कुछ सुनाओ। मुझे सुनाना पड़ा। मेरे भाषण के बाद उन्होंने भाषण किया और प्रश्नोत्तर का कार्यक्रम भी हुआ। मैं तो उनकी भेट में बहुत छोटी थी लेकिन इस बात से मुझे पता चला कि बाबा का ’जो आदेश है कि बहनों को आगे रखना चाहिए, बहनों को महत्व देना है और बहनों का पार्ट विशेष है, इसका उनको पूरा सम्मान था और वे एसा करते भी थे। उनमें यह भाव नहीं था कि मैं इतना पुराना और योग्य हूँ, यह तो बहुत छोटी है, इतने बड़े विश्वविद्यालय में यह कैसे हो क्या बोलेगी। बाबा ने जो ट्रेनिंग उनको दी थी कि बहनों को आगे चाहिए, इसे वे सदैव निभाते रहे। वे जानते थे कि मैं उम्र में भी और अनुभव में भी छोटी हैं लेकिन वे यह भी जानते थे कि बहनों के लिए बाबा की विशेष मदद होती और दआयें होती हैं। इसलिए हमेशा उन्होंने हर स्थान पर ऐसा ही किया और करते आये। यह एक सूक्ष्म और गहरी बात है। मैं नहीं जानती कि बहूत-से लोग इस सूक्ष्म बात को जानते हैं या नहीं, मानते हैं या नहीं कि बाबा की इन मर्यादाओं में बहुत सूक्ष्म रहस्य और सफलता छिपी है। हरेक ईश्वरीय मर्यादा एक आध्यात्मिक विधि है, उसमें बहुत गहरा राज़ समाया हुआ है। सफलता का मूलाधार ये मर्यादायें हैं। यह बात जगदीश भाई भलिभॉंति समझते थे और अनुसरण करते थे। मेरी दृष्टि में जगदीश भाई एक महान् स्पिरिचुअल मास्टर माइण्ड थे। मैं कहती हूँ, इस संस्था के लिए उनकी बुद्धि मास्टर प्लान थी। उनमें हर बात को, हर घटना को दूरदर्शी दृष्टि से देखने की कला थी। इसलिए मैं उनको कहती हूँ कि वे न केवल मास्टर माइण्ड थे बल्कि मास्टर फ्यूचर सीनर भी थे।

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(प्रजापिता ब्रम्हाकुमारी ईश्‍वरीय विश्‍व विद्यालय)

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