व्यक्ति एक व्यक्तित्व अनेक ब्रह्माकुमार भ्राता जगदीश चन्द्र एक जीवन्त जीवन-पथ

कैसे बोलना है, कैसे बैठना है- ये सब हम कन्याओं को सिखाते थे जब हम किचन में खाना बनाते थे, पीछे आकर खड़े हो जाते थे और हम कैसे खाना बना रहे हैं, देखते थे। हमें तो पता ही नहीं पड़ता था कि भाई साहब आये हए हैं। वे ऐसे चलते थे कि उनके पाँवों की आवाज़ ही नहीं होती थी। वे हमें भी ऐसा चलना सिखाते थे। उस समय वहाँ एक अल्युमीनियम की सीढ़ी हुआ करती थी। हम छोटे तो थे ही, उस सीढ़ी पर दौड़ते-दौड़ते चढ़ते थे और दौड़ते-दौड़ते उतरते थे। एक दिन उन्होंने मुझे बुलाया और कहा कि बिना आवाज़ के इस सीढ़ी पर चढ़ कर और उतरकर दिखाओ। ऐसे प्यार से, बातों-बातों में, कैसे चलना है, कैसे साहब से मिले बिना जाते ही नहीं थे। अगर किसी को दोपहर का बजे का समय दिया है तो वे 3.15 पर तैयार होकर नीचे विजिटिंग रूम में बैठ जाते थे और उनके लिए चाय-टोली का प्रबन्ध करवाते थे। कहते थे कि इतने समय पर विजिटिंग रूम में चाय-टोली पहुँचनी चाहिए। मतलब उनका हर कार्य विधिवत् होता था और समय से पहले वे तैयार होकर बैठते थे। भाई साहब में कला थी दूसरों से काम कराने की। वे कार्य के लिए कहते थे तो किसी का मन ही नहीं होता था कि ’ना’ कहें या ’भाई साहब मैं थका हूँ’, ऐसा कहें। जब डेरेवाल सेन्टर बना, वहाँ नया साल मनाना था। मुझे सेवा मिली थी केक बनाने की। मैं सुबह से केक बनाने में लगी रही। भाई साहब ने उस दिन क्लास में आने वाले सब भाई-बहनों को केक खिलाया, उसके बाद सेन्टर पर रहने वाले भाई-बहनों को, उसके बाद, कार्पे न्टरी का काम करने के लिए मधुबन से कुछ भाई आये थे उनको। केक बनाते-बनाते दोपहर हो गयी, मैं थक गयी थी। फिर भाई साहब ने मुझे बुलाया और पूछा, थक गयीं होंगी? भाई साहब के पूछने के ढंग से मुझे हँसी आयी और मैंने कहा, नहीं भाई साहब, थकी नहीं, और कोई सेवा है तो बताइये। फिर उन्होंने मुस्कराते हुए कहा, और एक केक बन सकती है ? आर्किटेक्ट को भेजनी है। ’ना’ बोलने का सवाल ही नहीं था। सच में मैं बहुत थकी हुई थी लेकिन भाई साहब को देखते ही थकावट भूल गयी और मैंने और एक केक बनाकर दिया। इस प्रकार, उनमें सेवा करने की और सेवा कराने की- दोनों विशेषतायें बहत अच्छी थीं। बहनों को चौदह घंटों की भट्ठी कराते थे यज्ञ के आदि में जैसे दादियों ने 14 साल भट्री की, वैसे बहनों को भी वे 14 घंटों की भट्ठी कराते थे। उस समय बहनों की हर बात का ध्यान रखते थे। बाबा के कमरे में भट्ठी का उद्घाटन कराते थे और शाम को वहीं उसका समाप्ति समारोह भी । दोनों कार्य भाई साहब खुद करते थे । भाई साहब सबको दृष्टि देकर बिठाते थे और लास्ट में दृष्टि देकर उठाते थेें । इस भट्ठी में सारा दिन बाबा के कमरे में बैठकर शरीर से डिटैच होने का और अपने पुराने संस्कारों को चैक करने का तथा उनको मिटाने का अभ्यास कराते थे। इसके अलावा अन्तिम समय के लिए कैसे तैयार रहें, इसकी भी प्रैक्टिस कराते थे। जैसे कि अन्तिम समय खाने-पीने के लिए कुछ नहीं मिलेगा तो भट्ठी में एक खाना छोड़ने के लिए कहा जाता था। वह समय बचा तो उसमें बाबा की याद में बैठना है। ऐसे पुरुषार्थ कराते थे। कहते थे, कभी परिस्थितियों से भागना नहीं यदि कोई बहन या भाई परिस्थितियों से घबरा जाता और वहाँ से हटने की सोच लेता तो भाई साहब कहा करते थे कि परिस्थिति और परीक्षाओं से डरकर हार नहीं माननी चाहिए क्योंकि अगर तुम मैदान से पलायन कर भी लो और कुएँ में भी चले जाओ तो भी तुम्हारा हिसाबकिताब तुम्हें नहीं छोड़ेगा इसलिए परिस्थितियों से भागना नहीं चाहिए। मुझे बहुत खुशी है कि मैं 16 सालों तक भाई साहब के नज़दीक रही और उनसे पालना ली। जब वे हँसने लगते थे तो उनकी आँखों में आँसू आते थे भाई साहब आमतौर पर रात्रि की क्लास में बहुत हँसाते थे और खुद भी हँसते थे। वे जब हँसने लगते थे तो बहुत हँसते थे और उनकी आँखों में आँसू आते थे। उनकी हँसी देखकर सामने वाले बहुत खुश होते थे। वे बहनों को सेवाक्षेत्र में निडर भी बनाते थे। हमें कहते थे कि तुम अकेली जाओ फलाने सेन्टर पर। (प्रजापिता ब्रम्हाकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय) (क्रमश : 77)

 

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