श्री वर्धमान स्थानकवासी जैन श्रावक संघ – आनंदवाणी

धर्म के मर्म को समझें

धर्म के नाम पर कईं जगह देवी-देवताओं के नामाश्रय में बलि दी जाती है । धर्म के नाम पर कुछ भी दुनिया करती है या यूँ कहें कि जिस भी क्रिया के साथ धर्म जोड़ दिया जाता है तो जुनून सवार हो जाता है । धर्म के नाम पर जो स्वीकार कर लिया जाता है, उसका अगर कोई विरोध करे तो वह उस धर्म का दुश्मन कहलाने लग जाता है । इस प्रकार की स्थिति धर्म में होती है । कहीं भी जिसने जो मान लिया उसका विरोध करें तो जान से हाथ भी धोना पड़ सकता है । दुनिया में कितने लोगों को इस प्रकार का विरोध सहना पड़ा और जान से हाथ भी धोना पड़ा । भारत में ही नहीं, पश्चिम के देशों में जहॉं के प्रोग्रेसिव लोग माने जाते हैं, वहॉं भी कितने लोगों को मौत के घाट उतरना पड़ा है । गॅलीलिओ को इसी कारण से फांसी मिली, सोकरेट्स ने इसी कारण से जहर पीया और जीजस को इसी कारण शूली पर चढ़ना पड़ा । धर्म के नामपर विरोध सहना पड़ा ।

लेकिन वास्तव में दुनिया को पूछो कि धर्म क्या है? तो जवाब नहीं मिलेगा । समझता ही नहीं कि धर्म की परिभाषा क्या है? केवल रुढ़िवाद और अंधविश्वास का पालन होता रहता है । और उसमें भी जिन्होंने धर्म के नाम पर बलि देना स्वीकार कर लिया- वो और निम्न स्तर के और उनको धर्म का वास्तविक मर्म जानना और मानना अति कठिन ।

एक घटना मैंने सुनी थी । हमारा चातुर्मास था – सिकन्दराबाद के उपनगर बोलारम में । वहॉं के स्थानक और देवी के मंदिर की एक ही दिवार थी । वहॉं के लोगों ने बताया कि कईं साल पहले यहॉं यह प्रथा थी कि चातुर्मास काल में एक दिन ऐसा आता था जब देवी की यात्रा होती थी और यात्रा में इतनी बलि दी जाती थी कि गलियों की मिट्टी खून से पूरी गीली हो जाती थी । जैन लोग 8-10 दिन घर से बाहर ही निकलते थे । दरवाजे बंद रखकर घरों के अंदर ही रहते थे । इसीलिए, चातुर्मास कराना तो बहुत ही मुश्किल था । एक बार एक साधुजी ने सोचा – बुद्धिमानी से काम लेना चाहिए । उन्होंने लोगों को कहके बलि देने वाले लोगों के ग्रुप से मुखिया को बुलाया ।

वह मुखिया आया । साधु जी ने कईं धार्मिक, सामाजिक, सामाजिक बातें करते हुए मुखिया से पूछा कि आपका समाज इतना बड़ा होते हुए भी आगे क्यों नहीं बड़ पाता । बात चलते-चलते अंधश्रद्धा पर आई । तब साधुजी ने पूछा – ‘‘धर्म के नाम पर, देवी के नाम पर जो कुछ आपके समाज में होता है, उस पर आपका क्या मत है?’’ मुखिया बोला- ‘‘मुझे यह बलि प्रथा बिलकुल पसंद नहीं है और उससे भी ज्यादा विडम्बना कि खुद अपने हाथों से यह करना पड़ता है ।’’ साधुजी तो चांस मिल गया और उन्होंने मुखिया को एक तरकीब बता दी ।

समय बीता । हर अमावस को भी, उस गांव के बाहर अध्यक्ष के द्वारा बनाया हुआ मंदिर था, वहॉं बलि होती थी । और फिर, स्थानक के बाजू वाले देवी मंदिर में होती थी । अमावस का दिन आया । अध्यक्ष जी के मंदिर में लोग जमा हो गए। आरती होने लगी और थोड़ी देर में ही 15-20 औरतें झूमने लगीं । बाल खोल दिए और फिर, नाचने लगीं । फिर, 7-8 पुरुष भी झूमने लगे । लोगों ने कहा – देवी आई, देवी आई । काफी देर देवी आए हुए लोग नाचते रहे और बोलने लगे – जल्दी से बलि दो, हमें भूख लगी है । जल्दी करो नहीं तो कुपित हो जाएँगे । गांव को तहस-नहस कर देंगे । लोग अध्यक्ष के पास देखते हैं । क्योंकि पहले अध्यक्ष जी ऊठे और घुरी चलाये तो बात आगे बढ़ेगी । लेकीन अध्यक्ष जी हिल नहीं रहे थे । तो लोगोने टोकना शुरू किया । इसीलिए अध्यक्ष जी देवीयों को बोले हॉं मॉं अभी कर रहे है । फिर थोडी देर बाद बोले, हॉं मॉं आपकी कृपा हो जाये । ऐसे ही करते-करते 2 से 2ः30 घंटे हूवे । नाचने वालों की स्पीड कम होने लगी । वो थकने लगे की इधर अध्यक्ष जी जोर-जोर से नाचने और झुमने लगे ।

सबको लगा आज तो बड़ी देवी आ गई । हमेशा छोटी-छोटी देवीयॉं आती थी आज तो बड़ी देवी आई । उनका वो नाचना देखकर सारे लोग थरथर कॉंपने लगे तथा जिनमें देवीयॉं आइथी वो भी डर गये । ऐसेमें ही अध्यक्ष जी बोले खामोश । आज तक मेरे नामसे मेरे बच्चों की बली देते रहे । मैंने इतने दिन सहन किया अब और नहीं सहन करूँगी । अभी से बलि देना बंद करो । सभी डरे हूवे तो थे और उन्होंने देवीरूपी अध्यक्ष जी को वचन दिया हम बली नहीं देंगे । और तब से लेकर आजतक वहॉं कोई बली नहीं दी जाती ।

हम आपस में लडते है । कितने गच्छ, कितने ही गण, कितनी ही सम्प्रदाय है । और हम इसी में कॉलर टाईट करते है की हमने अमुक गुरू के चेलों को अपनी तरफ कर लिया । हमारा सारा खून पसीना इसी में लगा रहे है । आपस में ही लड रहे है । क्यो हम इस प्रकार दिवारें खडी करें । ऐसी बातों में हम उलझ जायेंगे तो जिनवाणी को क्या श्रवण करेगे । और हमारी शक्ति में जायेंगी । बली प्रथा जैसी बातोंका भी विरोध कैंसे करेंगे, जैनत्व का प्रचार कैसे करेंगे । इसीलिए अपने पराये में मत उलझो । इसीमें उलझों गे तो जो प्राप्त करना चाहें वो नहीं प्राप्त हो सकेगा । अपना पराया न करते हूवे सबको अपना माने और जैनत्व को बढ़ाये । अरिहंत पद की ओर आगे बढ़े यही शुभकामना । ॐ शांती !

वे ऑफ लाईफ प्रणेता

ध्यानसिद्धा श्रमणी अक्षयश्री ‘आखा’जी म.सा.

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