श्री वर्धमान स्थानकवासी जैन श्रावक संघ – आनंदवाणी

गलती का सुधार

कभी आपने ताश के पत्तों के घर बनायें है? बहोत बनाये पर आज उनमें से कितने बचे एक भी नहीं । बरसात के दिनों में नदी । समुद्र किनारे की मिट्टी के कई घर बनाये बड़े नाजों से बनाये और उन्हे बनाकर खुश भी हुवे पर उन में से कुछ नहीं बचे । ना ताश के घरों की कोई किंमत आईन नदी । समुद्र के किनारे बनाये हूवे मिट्टी के घरों की किंमत आई । इधर बनाये इधर बह गये । ऐसे ही हम घर बनाते है । उसकी सुरक्षा का पुरा इंतजाम हम करते है । उसको कही से छोक ना रहे इसका ध्यान रखते है । अगर कही से उसको छेक रह जाए । छत या दिवार लिक हो तो उस घर की उम्र कम हो जाती है । गिरने की या और जादा छेक होने की संभावना हो जाती है । घर खराब होने लगता है । सुरक्षितता महसुस नहीं होती । जिंदगी मेंहम कई बार ऐसे ही सपने रंगाते है । ऐसे ही संकल्प लेतेहै । बहोत बाह हम सोचते ही रहते है । सोच-सोच में ही समय निकल जाता है । बहोत बार हम सोय लेते है पर कदम नही उठाते । कभी-कभी कदम उठाले पर 2-3 कदम उठाते हैं और रूक जाते हैं या तो लौट जाते हैं । जिंदगी में बहोत सारी बातों में ऐसाही होता है ।

आषाढ मुनी का भी ऐसा ही हूवा । मोक्षमार्ग पर कदम उठाये 2-4 कदम में ही संकल्प ढिला हो गया । कितना आश्वासन दिया या गुरुजी को, मैं संयम अच्छी तरह पालुँगा । पाला भी पर एक पल में बनायें हूवे महल को लाथ मार दी । और गुरुजी के समझाने पर भी नहीं संभले संयम छोड़कर नाटककार के घर चले गये । वहॉं नाटककार के दोनों बेटीयों के पती बनकर रहने लगे । बड़े प्यार से वे लोग उन्हें रख रहे है। उनका कहॉं मान रहे है । आषाढ के कहने पर मॉंस-मदिरा भी छोड दी है । आषाढ मुनी भी जल्दी हीनाटक कला सिखते है । और फिर अपने ससुर के साथ मिलकर खुब कमाई करते हैं। अपनी कला और लब्धी के जोर पर लोगो को जीत रहे है । अच्छे अच्छे नाटक सादर कर रहे है ।

ऐसे ही एक बार एक राजाने अपने यहॉं इंटरनॅशनल लेव्हल का नाटक का कार्यक्रम आयोजित किया । जगह-जगह से नाटक मंडळी वहॉं उपस्थित हो रही थी । आषाढ और उसके ससूर भी इस कार्यक्रम में सम्मेलित होने के लिए गये । वहॉंपर 15 दिन का कार्यक्रम था । एक-एक नाटक मंडळी अपना कार्यक्रम दिखा रही है । एक से बढ़कर दुसरा, दुसरे से बढ़कर तिसरा नाटक सादर करता है । आषाढ का 10 वे दिन नंबर आता है । उन्होंने भरत चक्रवर्ती का केवलज्ञान का नाटक दिखाया । भरत चक्रवर्ती की रिद्धी-सिद्धी, उनकी समृद्धी, उनका अंतःपूर, विशाल महल, भोग विलास का पुरा वातावरण, लोगों का रास्तो पर । महल मे आवागमन दिखाते है । ऐसी रिद्धी-सिद्धी को किसीने कभी सपने में भी न देखी हो । भरत चक्रवर्ती का शिश महल दिखाया। जिसके उद्घाटन के लिए स्वयं भरत चक्रवर्ती आते है । देखते है इतना सुंदर महल । महल को सारे देखते ही रहते है । भरत चक्रवर्ती भी उद्घाटन के लिए महल में प्रवेश करते है । सोचते हूवे जाते है। सोचते सोचते अपने उँगली की अंगुठी को निकाल रहे है पहन रहे है यहीं करते-करते अंगुठी निचे गिर जाती है । बडी मुल्यवान हिरे अंगुठी है । ढूंढते है पर हाय प्रतिबिंब ही आता है । शिश महल में हर जगह प्रतिबिंब ही दिखाई दे रहा है । इसी बीच नजर ऊँगली पर जाती है । और सोचते हे बाकी उंगलीया तो अच्छी लग रही है पर अंगुठी निकली ऊँगली सुहा नही रही । मतलब इस शरीर की शोभा आभूषणसे है । मुझे अंदर से सुंदर बनना है । और चिंतन में डुबते-डुबते केवलज्ञान हो गया । रिद्धी-सिद्धी, समृद्धी इन सारो से मोह छुट गया । और यह सादर करते हूवे आषाढ मुनी सोचते है । भरत चक्रवर्ती थे पर उन्होंने रिद्धी-सिद्धी छोड दी और मैं कहॉं आया संयम मार्ग कोछोड कर । वैराग्य भाव फिरसे जाग्रत हूवे ।

इधर उनकी पत्नीयॉं मौके का फायदा उठाकर घर मे शराब और मॉंस का सेवन करती है । उसी नशे में धुंध रहती है । बिखरा हूवा उनका रूप है । घर में हर जगह वही वातावरण है । 15 दिन में वापस आनेवाले आषाढ 10 दिन में ही इंटरनॅशनल लेवल के नाटककार बनकर फर्स्ट प्राईज लेकर खुशी खुशी पत्नीयों को दिखाने आते है । आगे की सारी मंडळी उनका नाटक देखकर हरा मान लेती है । और आषाढजित जाते है । पर घर आतेही घर का माहोल देखकर उन्हें गुरुजी यॉंद आते है । गुरुजी की बात याद आती है और वह वहॉं से निकलकर संयम की राह पर आगे बढ़ने के लिए चले जाते हैं।

कहने का तात्पर्य गिरना बुरा नहीं, गलती करना बुरा नहीं । लेकिन जो गलती का सुधार कर लेता हैं, वह ही संकल्प- युक्त होकर अरिहंत बन सकता है ।

वे ऑफ लाईफ प्रणेता

ध्यानसिद्धा श्रमणी अक्षयश्री ‘आखा’जी म.सा.

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