श्री वर्धमान स्थानकवासी जैन श्रावक संघ – आनंदवाणी

जीवन की सांपसीढ़ी – एक दिलचस्प धारावाह (कौशांबी नगरी)

(गतांक से आगे…)

जिस-जिस राज्य में, देश में राजदूत जाते, वहॉं-वहॉं की जानकारियॉं लेते जाते । वहॉं के राजा, प्रजा की व्यवस्था, राजकुमारियों आदि की जानकारी लेते गए । अभी तक 4 राज्यों की राजकुमारियों के नाम लिस्ट मेें लिख चुके थे । मन में पुरी फिट यद्यपि चारों में से कोई भी नहीं थी परंतु लिस्ट तो तैयार करीन ही थी । वे युवराज जैसे आदर्श नवयुवक के लिए शोभाप्रद हो व महाराज गुणवेसन के कुल की शोभा बढाए ऐसी योग्य कन्या की खोज में थे ।

आर्य सुमित्रने विचार किया कि मध्य भारत में घूमतेघुमते लगभग डेढ महिना हो गया है । अब दक्षिण भारत की ओर जाना चाहिए । पर, फिर ध्यान में आया कि एक प्रसिद्ध एवं जिसकी प्रशंसा व रेफरन्स मैं सुनता आ रहा हूँ वह नगरी रह गई । वह थी कौशांबी नगरी । अत: यात्रा मुड गई कौशांबी की ओर । चलते-चलते 8 वे दिन सुबह राजदूत कौशांबी पहुँचे। सीमा का निरीक्षण किया । टोल भरा और अंदर प्रविष्ट हुए । कौशांबी की व्यवस्था, घर आदि की संरचनाएँ, मार्केटका वातावरण, बाग-बगीचे, लोगोंकी चहल-पहल, लोगों का बोलना सब कुछ राजदूत को अपनी नगरी जैसी लगी । उन्हें राजगृही याद आ गई । वे सोचते हैं नगरीकी व्यवस्था ही इशारा कर देती है की वहॉं के राजा कैसे होंगे ?

एक नागरिकसे पूछकर कौशांबीकी अच्छी धर्मशाला में सुमित्र रुक गए । वहॉं अपना नाम पता दर्ज कराते समय लिखाया कि वे तीर्थयात्रा हेतू इस नगरी में आए हैं । भोजन के लिए वे भोजनालय में गए और वहॉं के मुनीमजी से कहा ‘यदि आपके पास समय हो, तो मुझे आपसे कुछ जानकारी चाहिए ।’ मुनीमजी ने स्वीकृती दे दी । राजदूत ने सर्वप्रथम अपना वास्तविक परिचय दिया और तत्पश्‍चात् कौशांबी नगरी में आने का कारण भी बताया । अत:, मुनीमजी से वहॉं के राज, रानी, उनकी कन्याएँ व अन्य परिवार के विषय में पूछा ।

मुनीमजी बोले ‘राजदूत हो आप ! फिर तो आपको राजभवन के अतिथीनिवास में रुकना चाहिए, ये धर्मशाला आप जैसों के लिए नहीं है ।’

‘नहीं नहीं मुनीमजी ! आपकी धर्मशाला में किसी बात की कमी नहीं हैं। स्वच्छता के साथ बाकी सारी व्यवस्थाएँ भी अच्छी हैं । बस, आप मुझे अगर कुछ जानकारी दे देवें, तो अच्छा रहेगा । योग्य लगा तो फिर में आगे राजभवन की ओर प्रस्थान करुंगा ।’ राजदूत बोले ।

मुनीमजी ने कहा ‘राजदूतजी ! हमारे महाराज मानसिंह का राजमहल नगरी के अंत में स्थिर है । सात मंजिला राजभवन है । उत्तम कारिगरी से युक्त है । राजमहल के बाहर अनेक विशाल खंड उपखंड हैं । राजभवन में सेकडों दास-दासी आज्ञा पालन में तत्पर दिखाई देते हैं ।

हमारे महाराज तो हमारे पालनहार हैं । जैसे एक पिता अपने पुत्र को संभालता है, उसीप्रकार हमारे राजा हमारा पालन करते हैं । वे जैन धर्म के उपासक हैं । उन्होंने राज्य में इसप्रकार की व्यवस्थाएँ करी हैं की बेरोजगारी की समस्या ही खत्म हो गई है । चोरी-लूटपाट आदी का भय भी नहीं है । हम प्रजाजन तो ऐसा ही मानते हैं की हमारे अनंत पुण्य के उदय से हमें ऐसे राजा मिले । इतने प्रेमळ एवं न्यायप्रिय होने के बावजूद भी उनके अधीन क्षेत्रों में उनका दबदबा निराला है । उनकी दृढता एवं शूरवीरता के कारण शत्रू भी हमारे राज्य पर आँख उठाने से डरते हैं । महाराज की महारानी कमलावती भी उनके अनुरुप शोभती है । तथा उनकी दोनों राजकुमारियों

 वे ऑफ लाईफ प्रणेता, ध्यानसिद्धा

श्रमणी अक्षयश्री ‘आखा’जी म.सा.

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