श्री वर्धमान स्थानकवासी जैन श्रावक संघ – आनंदवाणी

जीवन की सांपसीढी एक दिलचस्प धारावाह (आश्रम में अभ्यास)

(गतांक से आगे…)

दोनों भाईयों की जोडी राम-लक्ष्मण के समान सुशोभित हो रही थी । जिसप्रकार वासुदेव एवं बलदेव में गाढ प्रेम होता है, उसीप्रकार इन भाईयों में भी विकसित हुआ । जैसे वासुदेव-बलदेव हर समसय साथ-साथ रहते हैं, हर क्रिया-कलाप एकसाथ, उसी प्रकार ये दोनों भाई भी बडे हुए ।

सुखपूर्वक समय बिताते हुए भीमसेन 7 वर्ष का और हरिषेण 5 वर्ष का हुआ । महामंत्रीने राजा को कहा कि अब राजकुमार उचित वय में आ गए हैं, अब इन्हें जीवन जीने योग्य, व्यक्तित्व निर्माण की दृष्टी से, जिंदगी जीने योग्य, व्यक्तित्व निर्माण की दृष्टीसे, जिंदगी के हर पहलू में भेजा जाए । जिसप्रकार बच्चोंको स्कूलमें भेजा जाता है, भले ही घरमें अच्छे संस्कार देनेवाले योग्य व्यक्ति हैं, भलेही घरमें शिक्षा देनेवाले टीचर, प्रोफेसर है तथापि व्यवस्थित क्रमश: अनुशासनबद्ध शिक्षण हेतू बच्चोंको स्कूल में भेजा जाता है । उसीप्रकार उस जमानेमें गुरुकुल हुआ करते थे ।

राजा और रानी का बच्चोंके प्रति और बच्चों का भी मॉं-बाप के प्रति अति मोह था । अत: किसीकी भी इच्छा नहीं थी की दूर जाया जाए । क्योंकि उस काल में यह रिवाज था की अमुक वर्ष तक गुरुकुल में ही रहकर विद्याध्ययन करना, गुरुकुल से बाहर नहीं जा सकते । इसीलिए, मॉं-बाप का दिल नहीं माना । परंतु मंत्री आदि के समझाने पर राजाने अपने आपको तैयार किया । कहते हैं पिताका दिल कठोर होता है और माताका दिल कोमल होता है । मॉं का दिल मलाई होता है तो पिताका दिल नारियल होता है । उपरसे कठोर और अन्दर से नरम । लेकिन मैं कहती हूँ की पिता का दिल भी मॉं के दिल जैसा ही मलाई होता है । नारियल अन्दरसे कुछ तो चबाना पडता है इतना कठोर तो होता है । पर पिता का दिल इतना भी कठोर नहीं होता । वह नरम होता है । फर्क केवल इतना कि मॉं का दिल ओपन होता है, उसपर कोई कव्हर नहीं होता और पिता का दिल कव्हर सहित होता है कोमल दिल पर कर्तव्यका कव्हर होता है । इसीलिए, मॉं के दिल की कोमलता फटाफट मालूम पडती है और पिताके दिल की नहीं ।

राजा भीमसेनने भी कर्तव्य परायण दिलको तैयार किया और रानी प्रियदर्शना को भी तैयार किया । महामंत्रीजीको आज्ञा देदी राजकुमारोंके योग्य गुरुकुल की जानकारी लेने की ।

महामंत्रीने जानकारी लेकर राजा को सूचना दी की राज्य में ही एक सुप्रसिद्ध गुरुकुल है । वहॉं पे दूर दूर से विद्यार्थी पढने आते हैं । और वहॉं का वातावरण भी प्रिय है । छोटे-बडे सभी विद्यार्थी मिलाके कुल 700 बच्चे उस गुरुकुल में है । बच्चों के ग्रुप बनाए हुए हैं और हर ग्रुप के लिए झोपडी निश्‍चित की हुई हैं । गोबरसे सजी हुई जमीन और पत्तोंसे बनी झोपडी बच्चों के निवास के लिए है । शस्त्र, शास्त्र, तर्क, न्याय, संगीत, काव्य, आयुर्वेद, धनुर्वेद आदि सभी प्रकार की व्यावहारिक, अध्यात्मिक, सामाजिक, धार्मिक शिक्षा उस गुरुकुल में विद्यार्थियों को दी जाती है । स्वच्छता गुरुकुल की अपनी निशाणी है । उच्चकोटी के विद्वान, पंडित, शिक्षक अपने परिवार सहित वहीं रहते हैं । बस, राजन् ! बच्चों को बाहरी दुनिया में नहीं जाने दिया जाता और बाहर का भी कोई बच्चों से आके नहीं मिल सकता । साल में एक बार केवल माता-पितासे बच्चे मिल सकते हैं । बाकी, बच्चोंने गुरुकुल के नियमानुसार अनुशासनपूर्वक गुरुकुल में ही रहना ।

 

 वे ऑफ लाईफ प्रणेता ध्यानसिद्धा

श्रमणी अक्षयश्री ‘आखा’ जी म.सा.

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