श्री वर्धमान स्थानकवासी जैन श्रावक संघ – आनंदवाणी

जीवन की सांपसीढी – एक दिलचस्प धारावाह (कुलदीपक का आगमन)

(गतांक से आगे…)

राजा-रानी सुख में मग्न थे तथापि जिनधर्म को भूले नहीं । यथाशक्ती आराधना करते थे । उनका यह दृढ विश्‍वास था की यह खुशखबरी धर्म का ही फल है । अंत:, पुण्य को टिकाए रखने के लिए धर्म आवश्यक है ।

समय व्यतित हुआ । रानी शुभ भावना भाने का ध्यान रख रही थी । बच्चे की आत्मा गर्भ में आते ही रानी उसको संस्कार देने का प्रयत्न कर रही थी । वह सावधान रहती की कहीं उससे ऐसा भाव, वचन अथवा क्रिया न हो जाए जो बच्चे पर गलत असर डाले । केवल शुभ में ही समय बिताने का ध्यान रखती । राजा भी रानी का पूरा ध्यान रखते । रानी को आनंदित रखने का ही प्रयत्न करते । उसकी हर इच्छा-उपवन विहार, अश्‍वारोहण सवारी, साधर्मिक भक्ति (सेवा-दान आदी), सामायिक करना, साधु-साध्वी दर्शन-वन्दन करना, धर्म चर्चा करना इत्यादी सभी इच्छाएँ पूरी करते थे ।

यह केवल स्त्री का ही कर्तव्य नहीं होता की वह शुभ का ध्यान रखे बल्कि उसके आजू-बाजू वाले, परिवार वालों का भी कर्तव्य होता है की वह स्त्री का ध्यान रखें । तथा इतने सालों बाद ऐसा अवसर आया था, इसीलिए दास-दासी आदि भी उसका बहुत ध्यान रखते थे ।

प्रसन्न वातावरण में समय आगे बढा । ठीक 9 महिने 10 दिन बीतने के बाद रानी प्रियदर्शना ने तेजस्वी पुत्ररत्न को जन्म दिया । कक्ष के बाहर राजा, मंत्री, सेनापति, कोतवाल, नगरसेठ, राजपरिवार चक्कर लगा रहे थे की क्या समाचार आएँगे ? रानी जी का क्या हाल है ? इतने में दासी आई और उसने का- ’महाराज की जय हो, विजय हो । महाराज ! कुलदीपक का आगमन हुआ है । आप प्रसन्न हो जाईए ।’

राजा ने आनंदित होकर सूचना देने वाली दासी को खूब सारी भेंट देकर सन्मानित किया । पुरी नगरी मेें बधाई बॉंटी गई । सभी नगरवासियों ने राजपुत्र का जन्मोत्सव मनाया । पुत्र-जन्म की खुशी में राजा साधु-साध्वियों को विनंती करके लेकर आया और आहार बहराया । राजसभा में कर्मचारियों का यथायोग्य सत्कार किया गया । कारागृह से बंदियों को मुक्त कर दिया गया ।

बारहवें दिन स्वजन, स्नेहीजन, सम्बन्धियों तथा नगर के प्रतिष्ठीत और मुख्य व्यक्तियों की उपस्थिती में पुत्र का नामकरण किया गया । पुत्र जन्म के समय धनु राशि का चंद्र होने से तथा सूर्य के स्वप्न के अनुसार पुत्र का नाम भीमसेन रखा गया ।

भीमसेन जन्म से ही स्वस्थ व सुंदर था । उसकी छोटीछोटी आँखों मे एक अपूर्व तेज चमकता था । मस्तिष्क भी विशाल था । केवल भूख लगने व ठंडी-गर्मी का अनुभव होने पर ही वह रोता अन्यथा हर समय वह मुस्कुराता रहात था । एक तो राजपुत्र, उस पर भी शांत और हंसमुख । इस कारण से हर कोई उसे प्रेम करता । धार्मिक माता-पिता उसे धर्म के संस्कार भी देते । राजभवन युवराज की किल्लोल से नंदनवन जैसा बन गया था ।

भीमसेन जब दो साल का हुआ, तब रानी प्रियदर्शना ने चॉंदनी रात में पुन: एक मनोहर स्वप्न देखा- अंतिम प्रहर में समस्त संसार को ललकारता हो, ऐसा वनविहारी मृगेन्द्र (सिंह) देखा । जिस प्रकार भीमसेन के समय सारी क्रिया घटित हुई थी, उसी प्रकार अभी भी हुई और राजपुरोहित आदि के कथनानुसार छोटे राजकुमार का नाम हरिषेण रखा गया ।

जहॉं एक भी बालक की आशा नहीं थी, वहॉं दो-दो पुत्रों का आगमन हो गया । माता-पिता को अपना हर्ष व्यक्त करना मुश्किल हो रहा था ।

वे ऑफ लाईफ प्रणेता

ध्यानसिद्धा श्रमणी अक्षयश्री ‘आखा’जी म.सा

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