श्री वर्धमान स्थानकवासी जैन श्रावक संघ – आनंदवाणी

जीवन की सांपसीढ़ी – एक दिलचस्प धारावाह (अंधेरी रात्रि में सूर्य का प्रतिबिंब)

गतांक से आगे…

अमावस्या की अंधेरी रात में जहॉं चंद्र के दर्शन भी दुर्लभ हैं वहॉं सूर्य की तो बात ही क्या? राजगृही नगरी में राजा-रानी का संसार सुख से आनंदमय व्यतीत हो रहा था । एक बार रात्री के चौथे प्रहर में प्रियदर्शना रानी ने अमावस्या की अंधेरी रात में सूर्य का प्रतिबिंब देखा । वह सोच में पड गई की दीपकों का मंद-मंद प्रकाश शयनकक्ष में फैला हुआ है । उस समय लाईट का जमाना नहीं था । दीपक ही प्रकाश फैलाते थे अंधरे में । रानी ने देखा आकाश में तो तारे झिलमिला रहे है । रात्री का अंतिम प्रहर चल रहा है । सूर्योदय होने में तो अभी बहुत समय शेष है । विचारों की श्रृंखला के अंत में ख्याल आया कि रानी ने स्वप्न देखा है । और स्वप्न देखकर उसकी नींद खुली और उसे लगा की वो हकीकत में देख रही है । परन्तु अब समझ में आ गया की वह सपने में काली रात में सूरज को देख रही थी । रानी ने सोचा की अच्छा, तेजस्वी सूरज देखा है, इसलीए सोना नहीं चाहिए । स्वप्न शास्त्र में कहा गया है की इच्छा सपना देखने के बाद सोना नहीं और बुरा सपना देखने के बाद सो जाना क्योंकी पुन: सोने से सपने का फल नष्ट हो जाता है । लेकीन यह भली भांती ज्ञात होना चाहिए की कौनसा सपना शुभ है, कौनसा अशुभ? क्योंकी यूँ हँसना अच्छा है पर सपने में हँसना अच्छा नहीं, ऐसे ही किसी को मरा हुआ देखना इच्छा है इत्यादी । अंत: ज्ञान हो तो जागने-सोने का निश्‍चय हो ।

रानी प्रियदर्शना को भी स्वप्नों का ज्ञान नहीं था, परन्तु यह स्वप्न उनके मन को खुशी दे रहा था । सपना देखके वे आनंदित मुड में थी, अत: वह पुन: सोई नहीं । नवकार मंत्र के स्मरण में लग गई ।

प्रभात होते ही उसने राजा को बतया अपना सपना । राजा को भी अच्छा लगा । फिर, राजसभा में राज ज्योतिषियों एवं स्वप्न पाठकों से इस सपने का फल पुछा गया । प्रधान ज्योतिषी ने बताया वह स्त्री भाग्यशाली होती है जो सम्पूर्ण महास्वप्न अथवा उनमें से कोई एक भी स्वप्न देख ले । महाराज! आप एवं महारानी जी सौभाग्यशाली हैं की महारानीजी ने यह सपना देखा क्योंकी यह महास्वप्नों में से एक है । यह निर्देशित करता है की महारानीजी कुछ समय में ही एक उत्तम गुणों से युक्त पुत्ररत्न को जन्म देंगे ।

प्रधान ज्योतिषी की बात सुनकर राजा बहुत हर्षित हुआ और भेंट स्वरुप अपना गले का हार उनकों दे दिया । अन्य स्वप्न पाठकों ज्योतिषियों को यथायोग्य स्वर्णमुद्राएँ देकर विदा किया । अति आनंद के कारण राजा फूला नहीं समा रहा । पूरी नगरी में भी यह समाचार फैल गए । प्रजाजन भी बहुत आनंदित थे ।

घर में संतान आनी है- इसी बात सें खुशियॉं छा जाती है । पुत्र पैदा होने वाला है ये सुनके तो और भी नाचने लगते है । लेकिन राजा गुणसेन का तो और भी एक कारण था । पूर्वकाल में किसी ने राजा-रानी के लिए कहा था की वे जिन्दगी भर नि:संतान रहेंगे । और हो भी ऐसा ही रहा था । शादी को कुछ साल हो चुके थे परन्तु संतान घर में नही आई थी । राजा-रानी ने भी इस बात को स्वीकार कर लिया था। प्रजा ने भी स्वीकार कर लिया था । बस, एक बात लगती थी की आगे राज्य कौन चलाएगा?

अब, स्वप्न का फल सुनके राजा-रानी, प्रजा सभी आनंदित थे क्योंकी बच्चे का सुख भी मिलेगा और राज्य को उत्तराधिकारी भी मिलेगा ।

 वे ऑफ लाईफ प्रणेता

ध्यानसिद्धा श्रमणी अक्षयश्री ‘आखा’जी म.सा.

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