श्री वर्धमान स्थानकवासी जैन श्रावक संघ – आनंदवाणी

करुणा भाव

अरिहंत पद प्राप्ती की अगली सीढी है करुणा-भाव । बिना स्वार्थ, बिना मोह, बिना ममत्व भाव के जब हम केवल अपनों पे ही नहीं बल्की संपूर्ण जगत् के सभी जीवों पर करुणा भाव रखते है, तभी हम अरिहंत पद के योग्य बनते है।

जो करुणा से लबालब भरा हो, वह किसी का दुख नहीं देख सकता । हर जीव जीना चाहता है । चाहें वह छोटे से छोटा एकेन्द्रिय जीव भी क्यों न हो? आप मौज-शौक के नाम पर, सजावट के लिए, धर्म के नाम पर पानी बहाते जाते हो । शादियों मे फूलों की सजावट, Salad Decoration (सलाद डेकोरेशन), Lawns (लॉन्स) में कार्यक्रम, फलों को अलग-अलग शेप में कट करना इत्यादी से आपको क्षणिक आनंद की प्राप्ती होती है पर उन जीवों को पुछें उनका क्या हाल हुआ होगा? उन पर क्या बीती होगी? हमारा ध्येय अॅक्सिडेंट हो जाए अथवा कुछ काम करते समय त्वचा छील जाए, कट हो जाए तो क्या होता है हमारा? जैसे हमे तडफन होती है, सहन नहीं होता, ऐसे ही उन जीवों को भी वेदना होती है । और उनके भीतर आपके प्रती गुस्सा एवं बदले की भावनाएँ पनपती है । ध्यान रखिए, कभी किसी दुखी की, पीडित की आहे नही लें क्योकी उनको आहों ने भयंकर ताकद होती है और उनकी द्वेष भावनाएँ आपको तहस-नहस कर सकती हैं । वो जीव अपनी भावनाओं को एक्सप्रेस कर सकें या नहीं, पर भावनाएँ उनमें भी होती है ।

जब एकेंद्रिय की अवहेलना हमें इतनी महंगी पडती है तो पंचेंद्रिय के प्रति हमारा भेदभाव, हमारी क्रुरता कैसे भोगनी पडेगी? अत:, अरिहंत के मार्ग पर चलने वाला करुणा रस से ओतप्रेत होता है ।

करुणा-भाव भी हो और साथ-साथ नि:स्वार्थतता भी हो । तभी अरिहंत बना जा सकता है । नहीं तो, हमने किसी की Help (हेल्प) करी, सहयोग दिया तो बदले में हम अपेक्षा रखते हैं की उसने हमें कम से कम धन्यवाद तो देना चाहिए ।

नही ! आप अपने करुणा भाव के इलाज के लिए किसी के सहयोगी बनें न कि उसके उपर उपकार करने के लिए । इस प्रकार से शुद्ध करुणा, नि:स्वार्थ करुणा न केवल एकेंद्रिय पर हो, न केवल पंचेंद्रिय पर हो, न केवल तिर्यच पर हो, न केवल अपने मित्रों पर हो अपितु अपने शत्रुओं पर भी हो । तभी मोक्षमार्ग पर आगे बढा जा सकता है ।

जीवन-यापन हेतु निरर्थक हिंसा का त्या हो, सार्थक हिंसा को भी हम कम-कम करते जाएँ और कम-कम करते हुए भी करुणा-भाव को उजागर करते जाएँ तो निश्‍चित रुप से अरिहंत पद की प्राप्ती हमसे दूर नहीं रहेगी ।

We of Life (वे ऑफ लाईफ) के प्रणेता,

ध्यानसिद्धा श्रमणी अक्षयश्री ‘आखा’जी म.सा.

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